Wednesday, June 28, 2017

अर्जुनविषादयोग

अर्जुनविषादयोग

श्रीमद्भगवद्गीता को योग का सम्पूर्ण ग्रंथ कहा जाता है जिसके हर अध्याय में एक योग का वर्णन है। गीता के प्रत्येक अध्याय का समापन ‘ऊँ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अमुकयोगो नाम अमुकोSध्यायः’ के संदेश के साथ हुआ है। उदाहरण के लिये दूसरे अध्याय के अंत में लिखा है: ऊँ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोSध्यायः। प्रत्येक अध्याय के अंत में लिखे इसी प्रकार के वाक्यों के आधार पर विभिन्न अध्यायों के नामकरण विभिन्न योगों के नाम पर किये गये हैं। इस प्रकार गीता में तृतीय अध्याय से आगे वर्णित योगों के नाम हैं: कर्मयोग, ज्ञानयोग, कर्मसन्यासयोग, आत्मसंयमयोग, ज्ञानविज्ञानयोग, अक्षरब्रह्मयोग, राजविद्याराजगुह्ययोग, विभूतियोग, विश्वरूपदर्शनयोग, भक्तियोग, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग, गुणत्रयविभागयोग, पुरुषोत्तमयोग, दैवासुरसम्पद्विभागयोग, श्रद्धात्रयविभागयोग एवं मोक्षसन्यासयोग।
प्रथम अध्याय में वर्णित योग का नाम है: अर्जुनविषादयोग। इस अध्याय का कथ्य केवल इतना है कि युद्ध आरंभ करने से पहले अर्जुन ने श्रीकृष्ण से अनुरोध किया कि वह उसके रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में ले चलें जिससे वह उन सभी लोगों को देख सके जिनसे उसे युद्ध करना था, और यह देखकर कि युद्ध की इच्छा लिये हुए मरने-मारने को तैयार कौरव-सेना में उसके बन्धु-बांधव और पूज्य आचार्य लोग ही थे, उसका शरीर काँपने लगा, धनुष उसके हाथ से छूटने लगा, और वह खड़ा होने में भी असमर्थ होकर युद्ध न करने का निश्चय करके रथ के पिछले भाग में बैठ गया। अर्जुन को विषाद हुआ, जिसके नाम पर इस अध्याय का नाम पड़ा: अर्जुनविषादयोग। सवाल उठता है कि यह कौन सा योग हुआ? क्या बलवान शत्रु या शत्रुपक्ष में अपने सुहृज्जन को देखकर घबरा कर बैठ जाना भी कोई योग है? क्या इस योग के अभ्यास से भी किसी तत्त्व की प्राप्ति होती है? इस लेख में इन्हीं प्रश्नों के उत्तर ढूँढने का प्रयास किया जायेगा।
सब से पहले तो इस पर विचार करें कि युद्ध के आरंभ से पहले अर्जुन ने अपने विरोधियों को देखने के उद्देश्य से भगवान श्रीकृष्ण को रथ को सेनाओं के मध्य में ले चलने को क्यों कहा? क्या उसे पहले से नहीं मालूम था कि उसे किन से युद्ध करना है? युद्ध के पहले वाली रात में कौरवों के दूत शकुनि-पुत्र उलूक को दुर्योधन के नाम अपना संदेश देते हुए अर्जुन ने स्वयं कहा था: “में तुम्हारे सामने सबसे पहले पितामह भीष्म का ही संहार करूंगा——भीष्म, द्रोण, कर्ण के युद्ध में काम आते ही तुम अपने जीवन, राज्य और पुत्रों की आशा छोड़ दोगे।” फिर एक ही रात में वह यह कैसे भूल गया कि उसे युद्ध किन लोगों से करना था? कुछ विद्वान् इस मत के हैं कि अर्जुन कौरवों की अट्ठारह अक्षौहिणी की विशाल सेना देखकर डर गया था और युद्ध से बचने या भागने का बहाना खोज रहा था। यह मत भी ठीक प्रतीत नहीं होता क्योंकि सेनाओं के मध्य रथ ले जाने के ठीक पहले श्रीकृष्ण की सलाह पर अर्जुन ने भगवती दुर्गा की आराधना कर उन्हें प्रसन्न किया था, और उनसे विजयी होने का आशीर्वाद भी प्राप्त किया था; अर्जुन जानता था कि विजय तो उसी की होने वाली है, फिर डर का क्या मतलब?
एक तर्क तो यह दिया जा सकता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने एक युगांतरकारी उपदेश देने के लिये वातावरण का निर्माण करने हेतु अर्जुन को पहले मोह में डाला और फिर उसका निराकरण किया। गीता ही नहीं, पूरे महाभारत की व्याख्या कुछ महापुरुष इस प्रकार करते हैं कि महाभारत का युद्ध कोई वास्तव में ज़मीन पर ज़मीन के लिये लड़ा गया युद्ध था ही नहीं, और यह मनुष्य के मुक्त होने के लिये चलने वाले आन्तरिक संघर्षों की कहानी है जिसमें विभिन्न पात्र विभिन्न मनोवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन पर विजय प्राप्त करके अन्ततोगत्वा जीव मुक्त होता है। वर्तमान समय में पूज्य स्वामी अड़गड़ानन्द जी इस मत के प्रमुख प्रतिपादक संत हैं जिनकी ‘यथार्थ गीता’ गीता की शांकरभाष्य से बिल्कुल अलग टीका प्रस्तुत करती है जहाँ धर्मक्षेत्र एवं कुरुक्षेत्र और कुछ नहीं मात्र मानव-शरीर ही है जिसके अंदर मुक्ति के लिए संग्राम चलता रहता है; जहाँ भीष्म भ्रम हैं, द्रोण द्वैत हैं, कर्ण विजातीय कर्म है तो दुर्योधन गलत तरीके से अर्जित धन: इन प्रवृत्तियों से संघर्ष करके इन पर विजय प्राप्त करने का नाम ही मुक्त होना है। विद्वानों का एक वर्ग है जो गीता को महाभारत से बिल्कुल अलग और उसके बाद का ग्रंथ मानता है। इस मत के विद्वानों का विचार है कि गीताकार ने बड़ी चालाकी से अपने ग्रंथ को महाभारत में समाहित कर लिया है जिससे उसकी रचना का लोप न हो।
इस मत के अनुसार अगर महाभारत एक कल्पनिक घटना न भी हो, तब भी गीता तो शुद्ध काल्पनिक है। अगर इन मतों को स्वीकार कर लिया जाय, तब तो अर्जुन का युद्ध से पहले रथ को सेनाओं के मध्य ले चलने का अनुरोध मात्र कवि की कल्पना अथवा ज्ञान-प्राप्ति की तीव्र उत्कण्ठा है, परंतु ऋषि अरविन्द इन मतों की चर्चा के बाद इनको अस्वीकार कर देते हैं। उनके अनुसार अर्जुन काल और देश की सीमाओं और तदनुसार धर्म और कर्म की परम्परागत परिभाषाओं में आबद्ध एक कर्मठ मनुष्य है जिसका जीवन संघर्षपूर्ण रहा है और जिसके अब तक के द्वंद्वों में भाइयों, परिवार और समाज के दिशा-निर्देश उसका मार्गदर्शन करते रहे हैं। वह जानता था कि युद्ध अवश्यंभावी है, और वह यह भी जानता था कि उसे युद्ध किनसे करना है, परंतु युद्ध के मैदान में जब वह कौरवों की विशाल सेना के सम्मुख हुआ, तब अचानक उसके ऊपर यह तथ्य प्रकट हुआ कि वह कितने बड़े नरसंहार का कारण बनने जा रहा है! यह एक सामान्य परिस्थिति नहीं थी जिसमें उसकी परम्परागत शिक्षाएं काम आतीं; यह एक ऐसा अवसर था जो किसी योद्धा के जीवनकाल में एक बार उपस्थित होता है; वह अपने पिछले संघर्षों, पिछली प्रतिज्ञाओं और कुछ देर पहले ही मिले भगवती दुर्गा के आशीर्वाद को भी भूल गया, और किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गया। ऐसी मोहग्रस्त अवस्था में उसने भगवान श्रीकृष्ण से दोनों सेनाओं के मध्य ले चलने को कहा। उसी मोहग्रस्त अवस्था में सेनाओं के बीच जाकर जब उसे अपने सगे-सम्बंधी दिखे, तो उसका रहा-सहा विवेक भी जाता रहा, और वह विषादग्रस्त होकर, गाण्डीव छोड़कर ‘न योत्सामि’ कहते हुए रथ के पिछले भाग में बैठ गया। यह तो हुई अर्जुन के विषादग्रस्त होने की कथा, अब मूल प्रश्न पर लौटते हैं: अर्जुनविषादयोग कैसा योग है?
एक बात तो तय है: अगर युद्ध के आरम्भ में अर्जुन को यह विषाद न हुआ होता, अथवा वह अर्जुनविषादयोग में प्रवृत्त न हुआ होता, तो उसे सांख्यादि योगों की शिक्षा न मिली होती। इस विषादयोग का इतना महत्त्व तो स्वीकार करना ही होगा कि यह अन्य योगों में दीक्षा के द्वार खोलता है, पर सवाल उठता है: अर्जुनविषादयोग है क्या? क्या दोनों पक्षों को युद्ध के लिए उकसा कर मैदान छोड़कर भाग खड़े होना अर्जुनविषादयोग है? अगर ऐसा होता, तो हर गली में ‘युद्ध नहीं शान्ति चाहिए’ का बैनर उठाये घूमने वाले अर्जुनविषादयोगी  कहलाते। आज पूरा विश्व एक बड़े युद्ध के मुहाने पर खड़ा है, और युद्ध अवश्यम्भावी दीखता है, पर यह आधुनिक विषादयोगी शान्ति का झण्डा उठाये उसी पक्ष को शान्त करने में जुटे रहते हैं जो पहले से ही शान्त है, और इस प्रकार आक्रामक पक्ष को और आक्रामक होने के अवसर देते हैं। उदाहरण के लिए कश्मीर के संदर्भ में इन योगियों का आचरण सर्वविदित है। पत्थरबाजों और भारतीय सुरक्षाबलों के ठिकानों पर हमलों पर यह पूर्ण तटस्थ रहते हैं, और भारत सरकार पर इस बात के लिए दबाव डालते हैं कि वह पत्थरबाजों के साथ नरमी और सहानुभूति के साथ पेश आये। अगर अर्जुन इसी प्रकार के विषाद का शिकार हुआ होता, तो महाभारत का युद्ध शायद टल जाता, और फिर शुरू होती कौरवों के षड्यंत्रों की नयी श्रृंखला! स्पष्टतः यह अर्जुनविषादयोग नहीं है।
अर्जुनविषादयोग को समझने के लिये हमें पहले अर्जुन के चरित्र को समझना होगा क्योंकि अन्य योगों के द्वार खोलने वाला अर्जुनविषादयोग अर्जुन जैसे चरित्र पर ही अवतरित हो सकता है। युद्ध के मैदान में सभी थे, पर सगे-सम्बन्धियों की हत्या में भागीदार बनने की संभावना से विषाद केवल अर्जुन को ही हुआ, इसके कारणों की भी पड़ताल ज़रूरी है। अर्जुन एक सीधा-सादाऔर संवेदनशील प्राणी था: अर्जुन का अर्थ ही होता है-सरल, शुद्ध, सात्त्विक; उसे युद्ध और अनावश्यक मार-काट में अंतर मालूम था। युद्ध से अर्जुन को कोई परहेज नहीं है क्योंकि युद्ध उसका स्व-भाव है, और युद्ध के लिये वह प्रशिक्षित है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता-प्रवचन के अंत में उसे बताया भी कि युद्ध करना उसका स्वभाव है और युद्ध से वह भाग नहीं सकता (यद्यहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यते, मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वाम्नियोक्ष्यति। 18/59 तथा स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा, कर्तुम् नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोsपितत्। 18/60), पर अर्जुन मोहित हुआ अपने सगे-सम्बन्धियों को देखकर।वस्तुतः महाभारत के युद्ध में अर्जुन ने स्वयं को ऐसी परिस्थिति में पाया जिसमें उससे पहले किसी ने नहीं पाया था। उसके अतिरिक्त वह अर्जुन था-सीधा, सरल, सात्त्विक, कर्मयोगी: यदि वह यह सब न होता तो उसे भगवान श्रीकृष्ण का साख्य न मिला होता। इन दोनों उपादान कारणों ने मिलकर उसके मस्तिष्क की अवस्था ऐसी बना दी कि वह अहंकार, नीतियाँ, सिद्धान्त, पूर्वाग्रह आदि सबसे रहित हो गया। वह एक ऐसी तरल अवस्था में पहुँच गया जहाँ ज्ञान की तड़प के साथ स्वीकार करने की भी क्षमता जुड़ जाती है, पर बुद्धि को किनारे रखकर नहीं, बाकायदा तर्कों के साथ। यह वह अवस्था है जहाँ मनुष्य ज्ञान न केवल प्राप्त करने के लिए बल्कि उसे आत्मसात् करने के लिए भी तैयार हो जाता है। लेखक के विचार से यही अर्जुनविषादयोग है।
जिस प्रकार कठोपनिषद का नचिकेता यमराज से आत्मा के विषय में प्रश्न पूछने से पहले जानता था कि आत्मा ही अजर-अमर-अविनाशी तत्त्व है-अगर ऐसा न होता तो वह यमराज द्वारा दिए गये दीर्घायु, अपरिमित धन और अप्सराओं के प्रलोभनों को यूँ ही ठुकरा न देता, पर यमराज जैसा वक्ता सामने पाकर उसने उनसे आत्मा-विषयक गुह्य ज्ञान प्रकट करवा लेना उचित समझा, उसी प्रकार अर्जुन भी कदाचित यह जानता था कि युद्ध तो उसे करना ही है, पर महाभारत जैसा अवसर और श्रीकृष्ण जैसा गुरु समक्ष देखकर उसने भी अपनी ज्ञान-पिपासा को शांत कर लेना ही उचित समझा।
लेख समाप्त करने से पहले एक प्रसंग और। युद्ध और युधिष्ठिर के राज्याभिषेक तथा राजसूयादि यज्ञों के उपरांत एक दिन ऐसे ही अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से युद्ध से पहले दिया गया गीता का उपदेश दुहराने की प्रार्थना की, तो भगवान ने उसे झिड़क दिया क्योंकि उस समय अर्जुन का प्रश्न ज्ञान प्राप्त करने की उत्कण्ठा से प्रेरित न होकर केवल बुद्धि-विलास से प्रेरित था। मस्तिष्क को ज्ञान को ग्रहण करने योग्य तरल बना लेना ही अर्जुनविषादयोग है, और यह काम एक दिन में नहीं होता। योगी को इसके लिए पहले अर्जुन सा सरल, सात्त्विक और तपस्वी होना पड़ता है, तब जाकर भगवान श्रीकृष्ण जैसा गुरु प्राप्त होता है, और महाभारत के युद्ध सा अवसर उपस्थित होता है।
कृष्णम् वन्दे जगद्गुरुम्।

Friday, March 24, 2017

मोदी को हरा पाएगा महागठबंधन?

प्रातःस्मरणीय कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर, नेशनल कान्फरेन्स के युवा नेता उमर अब्दुल्ला और सेकुलरता के स्वघोषित चैंपियन जदयू नेता केसी त्यागी का विचार है कि सभी गैर-भाजपा दलों का एक महागठबंधन बनना अत्यंत आवश्यक है जिससे 2019 के लोकसभा-चुनाव में भाजपा को कड़ी टक्कर दी जा सके।
इस क्रांतिकारी विमर्श में यह स्वीकारोक्ति तो छिपी ही है कि मोदी के नेत्तृत्व में भाजपा अब इतनी शक्तिशाली हो चुकी है कि उससे अकेले निपटना अब किसी के लिए कल्पना से परे हो गया है, और यह भी स्पष्ट हो गया है कि हमारे यह विपक्षी नेता अंकगणित के बहुत अच्छे जानकार हैं: अंकगणित की इस गहरी समझ के कारण ही वह यह पता लगाने में सफल हुए हैं कि देश का बहुमत भाजपा के खिलाफ़ है, और इस बहुमत को एक साथ अपने पक्ष में लाकर वह मोदी को हरा सकते हैं।
ज्ञातव्य है कि गत लोकसभा-चुनाव तथा हाल ही में सम्पन्न हुए उत्तर प्रदेश के विधानसभा-चुनाव में भाजपा को क्रमशः लगभभग 31% और 40% मत मिले थे, जिसके आधार पर हमारे विपक्षी नेता और उनके साथी बुद्धिजीवी यह निष्कर्ष निकाल रहे हैं कि अभी कम से कम दो तिहाई जनमत मोदी के खिलाफ़ है, जिसे अपेक्षाकृत आसानी से एक मोदी-विरोधी छतरी के नीचे लाया जा सकता है, और इस तरह मोदी को सत्ता से बेदखल किया जा सकता है। विपक्ष और बुद्धिजीवियों के इस निष्कर्ष के पीछे सिर्फ़ उनका अंकगणित का ही नहीं उनका सामाजिक विज्ञान का ज्ञान भी है जो उन्हें बताता है कि इस दो तिहाई वर्ग का लगभग सारा भाग दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग से मिल कर बना है, जिनके वोटों के वह नैसर्गिक अधिकारी हैं, और मोदी जिस पर दावा नहीं कर सकते।
विपक्ष की ओर से और उनकी तरह सोचा जाय तो आज उनके पास महागठबंधन के अलावा कोई चारा भी नहीं है. वह मोदी के सम्प्रदायिक चरित्र का भोंपू अलग-अलग बजा कर देख चुके, अब उसी को एकसाथ मिलकर बजाने के अतिरिक्त वह कुछ सोच भी नहीं सकते, पर क्या इस सामूहिक वादन से कोई सुरीला राग निकलेगा? दलित-पिछडे और अल्पसंख्यक वोटों के ध्रुवीकरण का प्रयास राममनोहर लोहिया के समय से चल रहा है: बदलाव केवल यह हुआ है कि पहले यह प्रयास नेहरूजी की अभिजात्य कुलीनता के विरुद्ध हो रहे थे, और अब मोदी की तथाकथित साम्प्रदायिक नीतियों के विरुद्ध हो रहे हैं. पहले यह सफल नहीं हुए; हमारे बुद्धिजीवी मित्र अब इनके सफल होने को लेकर बहुत उत्साहित हैं. इस उत्साह के पीछे उनका यह विश्वास है कि पण्डित नेहरू तो दलित-पिछडे-अल्पसंख्यक वर्ग में भी काफी लोकप्रिय थे, पर साम्प्रदायिकता एक ऐसा मुद्दा है जिसे यह वर्ग कभी स्वीकार नहीं करेगा, इसलिये अगर साम्प्रदायिकता का मुद्दा इस वर्ग में ठीक से उछाल दिया जाय, तो मोदी की पराजय निश्चित है.
सबसे पहले तो हमारे नेताओं का यह निष्कर्ष ही संदेहास्पद है कि क्योंकि मोदी को किसी चुनाव में अभी तक 50% वोट नहीं मिले हैं, इससे सिद्ध होता है कि बहुमत उनके खिलाफ है। ठीक है कि मोदी को लोकसभा-चुनाव में 31% वोट मिले थे, पर इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी 69% लोग मोदी से उसी तरह घृणा करते हैं जिस तरह हमारे विपक्षी नेता एवं बुद्धिजीवी। इन वोटरों के पास कई विकल्प थे, और मोदी उनकी पहली पसन्द नहीं थे। अगर उन्हें दो ही विकल्प दिए जाते, तब भी उनका मत मोदी के ख़िलाफ़ ही जाता- यह मान लेना एक गलती है।  इस तरह महागठबंधन बनाने के सुविचार के पीछे का मूलभूत तर्क ही दोषपूर्ण सिद्ध हो जाता है, और परिणामतः उसके फलीभूत होने की सम्भाव्यता पर भी प्रश्नचिह्न खड़े हो जाते हैं। अब महागठबंधन के वास्तव में बन जाने की सम्भावनाओं पर विचार करते हैं।
इतिहास बताता है कि गठबन्धन मजबूत दलों और नेताओं के इर्द-गिर्द ही बनते हैं, और और उनका टिकाऊपन केंद्रीय दल या नेता की मजबूती से सीधे-सीधे समानुपातिक होता है। 1996 में जब चुनाव में 150 सीटें जीतने के बाद अटलजी ने एक गठबंधन बनाने की कोशिश की, तो वह सफल नहीं हुए। 1998 में जब उनहोंने भाजपा की 167 सीटों की बढ़ी हुई ताकत के साथ गठबंधन बनाने की कोशिश की, तो वह इसमें तो सफल रहे, पर उनका गठबंधन टिकाऊ नहीं हो सका; साल भर के बाद उनकी सरकार गिर गयी। 1999 में जब भाजपा 182 सीटें जीत कर आयी, तब गठबंधन भी बना, और वह पाँच सालों तक टिका भी: कभी एक दल ने अपना समर्थन वापस लिया भी, तो समर्थन देने के लिए दूसरा दल तैयार खड़ा था। बाद में 2004 में राजग की हार के बाद जब भाजपा का संख्याबल कम हो गया, तब उनका गठबंधन भी स्वतः बिखर गया। बीच में देवेगौड़ा जी के नेतृत्व में भी एक गठबंधन बना, पर उसकी चारो ओर से  टाँगें खींची जाती रहीं, और एक दिन वह अपनी मौत मर गया। उसके बाद गुजराल के नेतृत्त्व में गठबंधन बना जो गठबंधन के ही सबसे बड़े घटक द्वारा ही तोड़ दिया गया। वर्तमान समय में भी केंद्र तथा उत्तर प्रदेश में गठबंधन-सरकारें ही काम कर रही हैं, पर गठबंधनों के केंद्र में क्रमशः मोदी और योगी के नेत्तृत्व में पर्याप्त संख्या-बल के साथ भाजपा मौजूद है अतः इनके बिखरने की कोई सम्भावना नहीं है। इतनी सूचना यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि एक सफल गठबंधन के लिए गठबंधन के मूल में एक मजबूत दल और मजबूत नेता का होना अनिवार्य है। क्या विपक्ष के पास ऐसा दल या ऐसा नेता है?
इस प्रश्न पर अंतहीन चर्चा चल सकती है, पर इससे बचते हुए यह कहना ही पर्याप्त होगा कि न तो विपक्ष में इतना मजबूत कोई दल है जो अन्य दलों को आकर्षित कर सके, और न ही कोई सर्वमान्य नेता जिसके व्यक्तित्व के चुम्बक से सभी नेता और दल खिंचे चले आयें जिससे महागठबंधन आकार ले सके। सिर्फ़ बहस के लिये  अगर हम यह मान भी लें कि 2019 के चुनाव में अभी काफी समय है, और हमारे विपक्षी नेता इस बीच  अपने मतभेद दूर कर लेंगे, और एक महागठबंधन बना लेंगे, तब भी एक मजबूत दल और नेता के अभाव में यह गठबंधन ढीला-ढाला ही रहेगा। इसके अतिरिक्त यह भी संदेहास्पद है कि केवल एक व्यक्ति के प्रति तीव्र घृणा समय की धारा को मोड़ देने वाले एक महागठबंधन का आधार बन सकती है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि महागठबंधन बनने की राह में अनेक अड़चनें हैं। अब इसकी विवेचना करते हैं कि तमाम अड़चनों के बावजूद अगर 2019 के आम चुनाव तक महागठबंधन बन ही जाता है, तो इसकी सफलता की कितनी सम्भावनाएं रहेंगी।
पहली बात तो यह है कि विपक्ष और उनके समर्थक बुद्धिजीवियों ने खुद महागठबंधन की सफलता के सम्बन्ध में जो हिसाब लगा रखे हैं, वह एक ऐसी कल्पना पर आधारित हैं जिसे अर्थशास्त्र की भाषा में सेटेरिस परीबस (CETERIS PARIBUS: Other things remaining the same) कल्पना कहते हैं। वह यह मान कर चल रहे हैं कि जब तक वह महागठबंधन बनाने लिए जोड़-तोड़ करेंगे, तब तक मोदी चुप-चाप बैठे रहेंगे और महागठबंधन को आकार लेते देखते रहेंगे। यह कल्पना कितनी वास्तविक है? यह भी देखना होगा कि जिस दलित-पिछड़े-अल्पसंख्यक गठजोड़ के बल पर महागठबंधन बनाने की तैयारियाँ चल रही हैं, वह उसी तरह इनकी जेब में है जैसे यह कह रहे हैं? उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजों के विश्लेषण करने वाले अनेक धुरन्धर विद्वान अनिच्छापूर्वक ही सही, पर यह मानने पर विवश हुए कि मोदी ने इस दलित-पिछड़े-अल्पसंख्यक वर्ग के वोटों में भी सेंध लगा दी है। आने वाले समय में हम देखेंगे कि केंद्र सरकार की नीतियाँ और योगी आदित्यनाथ जैसे मुख्यमंत्रियों के हाथों उनका क्रियान्वयन इसी दिशा में बढ़ेंगे जिससे इस वर्ग के लोग और तेज़ी से मोदी के समर्थन में आयेंगे। ऐसे में केवल मोदी के खिलाफ नकारात्मक प्रचार और साम्प्रदायिकता का हौवा खड़ा करके विपक्ष इस वर्ग का समर्थन हासिल कर लेगा, इसकी सम्भावनाएं अत्यंत न्यून हैं। जैसे-जैसे महागठबंधन के प्रयास तेज़ होंगे, मोदी के दलित-पिछड़े-अल्पसंख्यक वर्ग के बीच पैठ बढ़ाने वाले कार्यक्रमों के क्रियान्वयन भी तेज़ होंगे, और इस दौड़ में विपक्ष मोदी को मात दे सकेगा-यह अभी तो एक दिवास्वप्न जैसा ही लगता है। फिर यह गठबंधन मोदी को हराने के लिए बन रहा है-जीतने के लिए नहीं; दूसरी ओर मोदी जीत के लिए खेल रहे होंगे। दोनों पक्षो के दृष्टिकोण का यह अंतर भी विपक्ष की सम्भावनाओं को दक्षिण दिशा की ओर ले जायेगा, और मोदी उसी तरह विजयी होंगे, जैसे अब तक होते रहे हैं।
जो भी हो, विपक्ष की महागठबंधन बनाने की यह योजना है बड़ी रूमानी। विपक्ष को महागठबंधन अवश्य बनाना चाहिए; और तो सबकुछ वह कर ही चुके हैं।
हमारी शुभकामनाएं विपक्षी नेताओं और उनके समर्थक बुद्धिजीवियों के साथ रहेंगी।

Monday, February 27, 2017

भक्त होने के फायदे

देश के खुर्राट बुद्धिजीवी जिनमें मुख्यतया प्रिंट और एलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मुख्यधारा के पत्रकार, वामपंथी विचारक व लेखक तथा गोष्ठियों और समाचर-चैनलों में अपने मत के समर्थन में गले और फेफडे की पूरी ताक़त लगाकर चिल्लाने और इस तरह दूसरों को चुप कर देने वाले वाचक सम्मिलित हैं, मोदी के समर्थकों के लिये एक बड़े अच्छे शब्द का प्रयोग कर रहे हैं: मोदी-भक्त!
मोदी, जैसा कि सभी को पता है, एक मनुष्य हैं जो इन बुद्धिजीवियों के समर्थन के बिना न केवल भारत के प्रधानमंत्री-पद पर जा विराजे हैं, बल्कि उस पर इनके विरोध के बावजूद पिछले ढाई सालों से लगातार विराज रहे हैं. हमारे बुद्धिजीवी मित्र मोदी को पसंद नहीं करते-कुछ लोग तो उनका नाम तक लेने में अपमान का अनुभव करते हैं, और दिन-रात मोदी को शाप दिया करते हैं. अगर इन बुद्धिजीवियों में एक-दो भी उच्च कोटि के ऋषि रहे होते, तो मोदी कब के जल कर भस्म हो गये होते, पर इन बुद्धिजीवी मित्रों से ऋषितुल्य होने की उम्मीद करना भी मूर्खता है क्योंकि न तो यह प्राचीन भारत में ऋषियों की उपस्थिति की कल्पनाओं में विश्वास रखते हैं, और न ही ऋषियों के समान बनने की इनकी कोई इच्छा है. अपनी-अपनी बुद्धियों के स्वनिर्मित सुरम्य वातावरण से निकल कर मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार के परे जाकर ब्रह्मचर्यादि साधनों की सहायता से सत्य नाम की चिड़िया के पीछे भागते रहने की कल्पना कितनी नीरस है! बुद्धिजीवी ऐसी फालतू बातों में समय नष्ट नहीं करते. मुद्दे की बात यह है कि हमारे बुद्धिजीवी मित्र समझते हैं कि केवल बुद्धिबल से वह मोदी को पलक झपकते ही न केवल सत्ता से बेदखल कर देंगे, बल्कि उन्हें परिदृश्य से ही गायब कर देंगे जिससे भविष्य में भी वह कभी प्रधानमंत्री न बन सकें. स्पष्टतया यह लोग अपने उद्देश्य में बहुत सफल नहीं हो रहे हैं, और इसके लिये मोदी के समर्थकों को जिम्मेदार ठहराते हैं. इसीलिये मोदी के समर्थकों के लिये इन्हें 'मोदी-भक्त' जैसा शब्द गढ़ना पड़ा.
'भक्त' शब्द पर हम थोड़ा विस्तार से चर्चा करेंगे. अभी तो यही कहना पर्याप्त होगा कि देश का अधिसंख्यक समाज 'भक्त' शब्द को बहुत सम्माननीय मानता है: उसके बहुत से पूज्य महापुरुषों के नाम के साथ यह शब्द प्रयुक्त होता रहा है, जैसे भक्त ध्रुव, भक्त प्रह्लाद, भक्त सूरदास, भक्त नरसी मेहता इत्यादि, पर हमारे बुद्धिजीवी मित्रों के शब्दकोश से यह शब्द कम से कम इस अर्थ में गायब है. बुद्धि के व्यापार में भला भक्ति का क्या काम? बुद्धिजीवी-शब्दकोश में 'भक्त' का अर्थ है- मूर्ख, बुद्धि के उपयोग में सर्वथा असमर्थ, दुराग्रही. देखने में आ रहा है कि मोदी के प्रशंसकों पर हमारे बुद्धिजीवियों के तमाम तर्कों का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है, और उनकी कड़ी मेहनत के बावजूद निजी तौर पर मोदी की स्वीकार्यता और विश्वसनीयता में तनिक भी कमी नहीं आयी है, हमारे बुद्धिजीवी मित्रों ने अपने तर्कों के खोखले, छल-युक्त अथवा झूठे होने की संभावनाओं को सिरे से खारिज करते हुए मोदी के समर्थकों पर ही इसका सारा ठीकरा फोड़ दिया, और उनके लिये 'भक्त' शब्द का प्रयोग शुरु कर दिया. तो मोदी के समर्थक हो गये मोदी के भक्त, जो सम्बंध तत्पुरुष समास के नियम से हो गये मोदी-भक्त! कुछ अति विशिष्ट श्रेणी के बुद्धिजीवी जो मोदी का नाम लेने में भी अपमान का अनुभव करते हैं, वह केवल 'भक्त' शब्द से ही अपना काम चला लेते हैं.
भक्ति की महिमा से हमारे धर्मशास्त्र भरे पड़े हैं. नारदभक्तिसूत्र के पहले तीन सूत्रों में भक्ति के बारे में कहा गया है: भक्ति प्रेम की पराकाष्ठा है (सा त्वस्मिन् परमप्रेमस्वरूपा), जो अमरत्व की ओर ले जाती है (अमृतस्वरूपा च) तथा जिसे पाकर आत्मा तृप्त हो जाती है, सिद्ध हो जाती है (यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, सिद्धो भवति). प्रेम, जो भोजनादि की तरह जीवन की एक आवश्यक आवश्यकता है, जिसके बिना जीवन अस्तित्व में तो बना रह सकता है, पर सार्थक नहीं हो सकता, भक्ति उसकी पराकाष्ठा है. प्रेम-रस में आकण्ठ आकण्ठ डूबा रसिक जब भक्त बन जाता है, तब वह सम्पूर्ण हो जाता है: उसकी कोई इच्छा नहीं होती, वह ईर्ष्या-द्वेष के परे निकल जाता है (यत्प्राप्प्य न किंचित् वांछति, न शोचति, न रमते, नोत्साही भवति-नारद भक्ति सूत्र). भक्ति की ऐसी महिमा देवर्षि नारद ने बतायी है.
श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने अनेक स्थानों पर भक्ति की महिमा का बखान किया है. अरण्यकाण्ड में शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश देने से पहले रामचंद्रजी भक्ति का महात्म्य बताते हुए कहते हैं: भगति हीन नर सोहइ कैसा, बिनु जल बारिद देखिय जैसा. भक्ति के बिना मनुष्य उसी तरह बेकार है जिस तरह बिना पानी के बादल. उत्तर काण्ड में काकभुशुण्डि-गरुड़ संवाद में भक्ति का विस्तृत निरूपण हुआ है:
जे अस भगति जानि परिहरहीं, केवल ज्ञान हेतु श्रम करहीं. ते जड़ कामधेनु गृह त्यागीं, खोजत आकु फिरहिं पय लागीँ. सुनु खगेस हरि भगति बिहाई, जे सुख चाहहिं आन उपाई. ते सठ महासिन्धु बिनु तरनी, पैरि पार चाहहिं जड़ करनी. सुनि भुसुण्डि के बचन भवानी, बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी. तव प्रसाद प्रभु मम उर माँहीं, संसय सोक मोह भ्रम नाहीं.
जो मनुष्य भक्ति की महिमा जानकर भी उसे छोड़ ज्ञान के पीछे भागते रहते हैं, वह घर पर खड़ी कामधेनु को त्याग कर दूध के लिये आक (मदार) के पेड़ को ढूंढने जैसा काम करते हैं. जो भक्ति से इतर अन्य उपायों से सुख की कामना करते हैं, वह मूर्ख और अभागे हैं जो बिना जहाज के तैर कर समुद्र पार करना चाहते हैं. भक्ति की ऐसी महिमा जान कर पक्षिराज गरुड़ बोले- है प्रभु! अब आपके प्रसाद से मेरे हृदय में संशय, शोक, मोह, भ्रम-कुछ भी नहीं रह गया है.
भक्ति को ज्ञान के आगे की अवस्था बताते हुए कागभुशुण्डि जी कहते हैं: वैराग्य रूपी तलवार से अपनी रक्षा करते हुए ज्ञान की तलवार से मद, लोभ, मोह आदि शत्रुओं को मारकर अंत में जो विजय मिलती है, वही भक्ति है: बिरति चर्म असि ज्ञान मद लोभ मोह रिपु मारि, जय पाइय सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि.
गीता में भक्त और भक्ति की महिमा का वर्णन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् मैत्रः करुण एव च, निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखःक्षमी. संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः, मय्यर्पित मनोबुद्धिर्योमद्भक्तः स मे प्रियः. (12/13, 14) जो किसी से द्वेष नहीं रखता, जो सभी प्राणियों से मैत्री और करुणा का भाव रखता है, किसी से ममत्व नहीं रखता (अर्थात् पक्षपात से रहित है), अहंकार से जो दूर है, दुःख और सुख के आवेगों को जो समभाव से झेल जाता है, जो क्षमाशील है, जो सतत संतुष्ट है, योगी है, जो अपने मन और बुद्धि को मुझे अर्पित कर (कर्मफल की चिंता से सर्वथा निर्लिप्त) अपने निर्दिष्ट कर्म में लगा हुआ है, ऐसा भक्त मुझे प्रिय है. यह भक्ति से मिलने वाले लाभ हैं: ईर्ष्या-द्वेषादि का नाश, सभी प्राणियों में समत्व, मैत्री एवं करुणा का भाव, क्षमा, संतोष आदि गुण भक्ति से प्राप्त होते हैं- ऐसा भगवान श्रीकृष्ण का वचन है, और इन गुणों का निरूपण मोदी के समर्थकों में हमारे बुद्धिजीवी मित्र कर रहे हैं. मोदी- भक्तों को इन बुद्धिजीवियों का विरोध भला क्यों करना चाहिये? और भक्त तो विरोध करते भी नहीं; वह तो इनके वचनों को उसी प्रकार झेल जाते हैं जिस प्रकार पर्वत वर्षा की बूँदों को झेल जाते हैं: बूँद अघात सहहिं गिरि कैसे, खल के बचन संत सहँ जैसे- (रामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड).
यह गुण देश के बहुसंख्यक समाज के लिये ग्राह्य होंगे, पर हमारे बुद्धिजीवी मित्र इन गुणों से विशेष प्रभावित होंगे-ऐसा मानने का कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं दीखता. वह तो मोदी-समर्थकों के केवल एक गुण से ही प्रभावित होकर उन्हें भक्त बता रहे हैं, और वह गुण है: उनका आराध्य के समक्ष पूर्ण समर्पण और उस पर अगाध विश्वास, जिसे बुद्धिजीवी अपने तमाम प्रयासों से तोड़ नहीं पा रहे हैं, और इसमें आश्चर्य की क्या बात है? गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया ही है: "मय्यर्पितमनोबुद्धिः"! अब हाल के मोदी-सरकार के विमुद्रीकरण के फैसले को ही लें: बुद्धिजीवी बताते रहे कि यह फ़ैसला बिल्कुल गलत और राष्‍ट्रीय हितों के बिल्कुल खिलाफ है, पर किसी मोदी-समर्थक ने इस पर विश्वास नहीं किया. बुद्धिजीवियों ने बैंकों की लाइनों में लगी जनता को भड़काने की कितनी कोशिशें कीं, पर जनता सड़क पर उतरने के बजाय धैर्यपूर्वक लाइनों में खड़ी रही. कारण बिल्कुल स्पष्ट है: विश्वास- ऐसा विश्वास जो बुद्धिजीवियों के तमाम प्रयासों के बीच चट्टान की तरह अडिग रहा, और जिससे मोदी-समर्थकों के मोदी-भक्त बन जाने के बुद्धिजीवियों के आरोप की पुष्टि होती है.
प्रश्न है कि जब भक्त होने के इतने लाभ हैं, तो हमारे बुद्धिजीवी मित्र भी बुद्धि को छोड़कर भक्ति का आश्रय क्यों नहीं लेते? अगर ऐसा हो जाय, तो दुनिया में कितनी शान्ति छा जायेगी! बुद्धिजीवियों को अवश्य इस सुझाव पर विचार करना चाहिये.