Monday, May 28, 2012

नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री कैसे बन सकते हैं?

नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के एक सशक्त दावेदार हैं। अन्य उम्मीदवारों के विपरीत उनकी दावेदारी प्रदर्शन पर आधारित है। वह पिछले 11 सालों से गुजरात के मुख्यमंत्री हैं, और इस पद पर रहते हुए उन्होंने कुशलतापूर्वक अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन किया है. अपने पेशेवर रवैये से अधिकांश पेशेवरों की प्रशंसा अर्जित की है। इतने सालों तक एक पद पर कुशलतापूर्वक कार्य करने के बाद स्वाभाविक है की वह अपने प्रमोशन के बारे में सोचें. उनकी फर्म (India Inc) के मालिक होने के नाते हमें भी सोचना चाहिए कि उनके कौशल का और अधिक लाभ उठाने के लिए उनका प्रमोशन कर देना चाहिए।
पर जैसा हमारे सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों में होता है, और शायद निजी क्षेत्र में  भी होता हो, केवल योग्यता रखने से प्रमोशन नहीं हो जाता।  और प्रधानमंत्री के पद पर प्रमोशन यूं भी कोई मामूली प्रमोशन नहीं है। यह प्रमोशन लेने के लिए मोदी को  नाकों चने चबाने पड़ेंगे।
सबसे पहले हम यह देखें कि मोदी के रास्ते की दिक्कतें क्या हैं।
1, उनकी पार्टी (भाजपा) की विश्वसनीयता शून्य पर पहुँच चुकी है, और वह निकट भविष्य में देश में इतनी सीटें जीतने की उम्मीद नहीं कर सकती कि अपने उम्मीदवार को प्रधानमंत्री बनवा दे। इस प्रकार से देखा जाय तो भाजपा मोदी के ऊपर एक बोझ है, जिसे उतारे बिना वह इस रास्ते पर एक कदम भी नहीं चल सकते। यह भी कहा जा सकता है की मोदी भाजपा पर एक बोझ हैं, जिसके रहते हुए भाजपा को पर्याप्त संख्या में सहयोगी नहीं मिल सकते. बात बिलकुल ठीक है, पर एक तो भाजपा को सहयोगी मिलने की संभावनाएं खुद भाजपा के पर्याप्त संख्या में सीटें जीतने के ऊपर निर्भर करती हैं, और दूसरे भाजपा के सहयोगी भाजपा के साथ सहयोग किसी मजबूरी में करते हैं। बंगाल, ओडिशा, आंध्र और बिहार के प्रयोगों से यह स्पष्ट है कि भाजपा के सहयोगी भाजपा की दुकान बंद करने के लिए उतने ही उत्सुक रहते हैं, जितने कि भाजपा के शत्रु। इसलिए भाजपा मात्र 75 सीटें जीतकर अगर केवल सहयोगियों के बल  पर (मोदी से इतर किसी और के नेतृत्व में) सत्ता में आने की सोचती है, तो यह एक दिवास्वप्न ही कहा जाएगा। सत्ता में आने के लिए उसे कम से कम 180 सीटें जीतनी ही होंगी। सहयोगी उसके बाद ही मदद कर पायेंगे। भाजपा न तो मोदी के बिना 180 सीटें जीत सकती है, न उनके साथ। इसलिए यही कहना यथेष्ट होगा कि भाजपा मोदी के ऊपर एक बोझ है
2. भाजपा के अन्दर ही मोदी के शत्रुओं की संख्या अच्छी-खासी है, और यह संख्या दिनोदिन बढ़ती ही जा रही है। इसके कारण मोदी के लिए पार्टी के अन्दर ही प्रधानमंत्री पद का नामांकन प्राप्त करना अत्यंत कठिन कार्य होगा।   
इस चर्चा से यह स्पष्ट है कि मोदी अगर प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, तो उन्हें भाजपा से पीछा छुड़ाना ही होगा।
अब यह देखा जाय कि इन कठिनाइयों के बाद भी मोदी कैसे प्रधानमंत्री बन सकते हैं।
भारत के अब तक के प्रधानमंत्रियों को चार श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है:
1.  नेहरू  परिवार के सदस्य
2. नेहरू परिवार के किसी सदस्य के पद-ग्रहण हेतु तैयार हो जाने तक नेहरू परिवार द्वारा समर्थित तदर्थ (स्टॉप गैप) व्यक्ति। इस श्रेणी में आने वाले प्रधानमंत्री रहे हैं: गुलजारीलाल नंदा, लालबहादुर शास्त्री, नरसिंहराव तथा चंद्रशेखर।
3. पूर्णतया अनजान व्यक्ति, जिनकी विशेषता यह थी कि उनका कोई शत्रु नहीं था। जैसे देवे गौड़ा और गुजराल।
4. विश्वनाथ प्रताप सिंह। इनकी अलग श्रेणी है।  देश के छोटे से इतिहास में यह एकमात्र ऐसे व्यक्ति हुए हैं, जिन्होंने एक स्थापित (established) राजनैतिक दल से विद्रोह किया, एक मुद्दे को लेकर जन-आन्दोलन छेड़ दिया, और उस मुद्दे पर विजयी होकर देश के प्रधानमंत्री पद पर जा पहुंचे। विश्वनाथ प्रताप सिंह को आप भले ही पसंद न करते हों, पर उनकी इस उपलब्धि पर उनकी दाद तो देनी ही होगी।
अब नरेंद्र मोदी पहली, दूसरी और तीसरी श्रेणियों में तो फिट हो नहीं सकते। उन्हें अगर प्रधानमंत्री बनना है, तो उन्हें विश्वनाथ प्रताप सिंह वाला रास्ता ही पकड़ना होगा।
क्या मोदी ऐसा कर सकते हैं? क्या कोई ऐसा मुद्दा है, जिस पर मोदी को उसी प्रकार का जन-समर्थन मिलने की संभावना है, जैसा विश्वनाथ प्रताप सिंह को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मिला था? भाजपा से विद्रोह का सही समय क्या होगा? आगे इन  प्रश्नों के उत्तर खोजने का हम प्रयास करेंगे। 
विश्वनाथ प्रताप सिंह एक मात्र उदाहरण हैं, जिनका अनुकरण मोदी को हर कदम पर करना होगा। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने अभियान के दौरान एक बार भी नहीं कहा कि वह प्रधानमंत्री बनना चाहेंगे। वह तो गाहे-बगाहे यही कहते थे की प्रधानमंत्री के रूप में वह एक असफल व्यक्ति (disaster) साबित होंगे। मोदी को भी यही कहना और कहते रहना होगा, कि वह प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते। एक काम जो मोदी बेहतर ढंग से करते रहे हैं, वह है मुंह बंद रखते हुए काम करना। अपने इसी गुण के बल पर ही वह अपने विरुद्ध अनेक दिशाओं से एक दशक से भी अधिक समय से लगातार चलाये जा रहे चरित्र हनन अभियान को मात देने में सफल रहे हैं। आगे भी उन्हें यही करना होगा।
सबसे पहली लड़ाई तो दिसंबर 2012 में होने वाला गुजरात विधानसभा का  चुनाव है,जो मोदी को  पूरी तरह जीतना होगा। अगर लड़ाई केवल कांग्रेस और मीडिया से होती, तो मोदी को कोई दिक्कत नहीं होती, पर यह लड़ाई केशुभाई पटेल, सुरेशभाई मेहता, संजय जोशी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी है, जिससे मामला थोड़ा  नज़दीकी होता दिख रहा है। मोदी को यह लड़ाई जीतने के लिए अपने पुराने अंदाज़ में काम करते रहना होगा: बोलने का काम केवल विरोधियों  पर छोड़ कर। यह लड़ाई जीतकर मोदी भाजपा में अपनी सर्वोच्चता अंतिम रूप से स्थापित कर देंगे।
इसके बाद की लड़ाई लड़ने के लिए मोदी को 'तेन त्यक्तेन भुंजीथा' की तर्ज़ पर मुख्यमंत्री पद का त्याग करना होगा। मोदी वैराग्य और थकावट वगैरह की बात करते हुए पद-त्याग कर सकते हैं। अच्छा तो यह रहेगा कि कुर्सी पर कोई विश्वसनीय व्यक्ति बैठा कर पदत्याग किया जाय, पर विश्वसनीय व्यक्ति आजकल मिलते कहाँ हैं? यह मान कर ही चलना होगा कि मुख्यमंत्री की कुर्सी एकबार गयी तो गयी। यह कोई बहुत बड़ा नुकसान नहीं होगा। मोदी 11 साल मुख्यमंत्री रह लिए, अब क्या कुर्सी साथ ले जायेंगे?
तो मोदी पार्टी को मज़बूत करने के लिए स्वेच्छा से मुख्यमंत्री का पद छोड़कर संगठन में कार्य करने के लिए दिल्ली पहुँच जायेंगे। यहाँ तक तो कोई दिक्कत नहीं है। 
अब मोदी को सही समय पर सही मुद्दे को पकड़ कर एक देशव्यापी आन्दोलन छेड़ना होगा, और यह करने से पहले भाजपा को भी छोड़ देना होगा। मुद्दा ऐसा होना चाहिए, जिसकी पहुँच हर वर्ग में हो। इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखना होगा कि उनकी हिंदूवादी छवि को कहीं से भी कोई नुकसान न हो, बल्कि हो सके तो उसमें और वृद्धि ही होती रहे।
अब ऐसा मुद्दा क्या हो सकता है? विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया था। यह मुद्दा अब बासी हो चूका है, और अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने इसका मजाक बना कर रख दिया है। यद्यपि यह मुद्दा सबको प्रभावित करता है, पर मोदी को इसको ले कर लड़ाई छेड़ने से कोई लाभ नहीं होगा। इस मुद्दे पर पहले से चल रहे आन्दोलनों में से किसी एक का समर्थन या विरोध उन्हें करना ही होगा, और दोनों सूरतों में मोदी को कोई लाभ नहीं मिलेगा। रामजन्मभूमि के मुद्दे पर आन्दोलन का भाजपा ने खूब लाभ उठाया। इस मुद्दे की पहुँच भी समस्त हिन्दू समुदाय में थी, पर इसी मुद्दे पर ढुलमुल रवैये ने भाजपा की विश्वसनीयता को ही समाप्त कर दिया, और इस मुद्दे को दोबारा गरमाने की कोशिशें कोई परिणाम नहीं दे सकेंगी, चाहे उसे उठाने वाले नरेंद्र मोदी ही क्यों न हों। 
शासन-प्रणाली (Governance) एक ऐसा मुद्दा हो सकता है। मोदी ने अपने 11 वर्षों के एक बेहतर शासन-प्रणाली गुजरात-वासियों को दी, जिस पर सभी का अधिकार है। केवल बिजली क्षेत्र की बात करें, तो गुजरात के गाँवों में और केवल गुजरात के गावों में आज बिजली चौबीसों घंटे उपलब्ध है। दूसरे राज्यों में ऐसा न होने का कोई कारण नहीं है। गुजरात राज्य की बिजली कम्पनियाँ वर्ष 2006-07 से लगातार  फायदे में चल रही हैं। कोई कारण  नहीं है जिसके लिए उत्तर प्रदेश राज्य की कंपनियों को घाटे में चलना चाहिए। गुजरात में पिछले 3 सालों में 1000 मेगावाट से अधिक के सौर ऊर्जा संयंत्र  लगे हैं, जो बिहार की कुल उत्पादन क्षमता से अधिक है। उत्तर प्रदेश में इसी दौरान 5 मेगावाट का एक सौर ऊर्जा संयंत्र लगाया गया है। बिजली के क्षेत्र में चल रही इस अव्यवस्था को ले कर मोदी आन्दोलन छेड़ सकते हैं। लोग उनकी बातों को गंभीरता से लेंगे, क्योंकि गुजरात में उन्होंने इस व्यवस्था को ठीक कर के दिखाया है।  सरकारी बिजली कंपनियों के नुकसान में चलने का एक कारण (बहुत बड़ा या प्रमुख कारण नहीं) अल्पसंख्यक वर्ग के महापुरुषों के द्वारा दादागिरी से बिना पैसे दिए हुए बिजली लेना है। मेरे सामने उत्तर प्रदेश  के एक बड़े जिले के कलक्टर ने एक बैठक में कहा था कि जिला मुख्यालय के अल्पसंख्यकों के मोहल्ले में वह फ़ोर्स लेकर भी जाने की हिम्मत नहीं कर सके। बिजली के क्षेत्र में अल्पसंख्यक-तुष्टीकरण तथा उनके दबाव के आगे झुकने का खेल तो सभी जगह चल ही रहा है। बिजली क्षेत्र की अव्यवस्थाओं के खिलाफ अपने अभियान में इस खेल का ज़िक्र भी कर सकते हैं, जिस पर उन्हें उन हिन्दुओं का भी समर्थन मिलेगा, जो घोर हिंदूवादी नहीं भी हैं। मैं समझता हूँ कि अगर कोई आदमी जिसकी काम को कर दिखाने के दावे के कारण विश्वसनीयता बनी हो, अगर देश में बिजली की व्यवस्था ठीक करने का आश्वासन दे, तो जाति-धर्म की दीवारों को तोड़ कर लोग उसको समर्थन देंगे। इस मुद्दे पर पहले भी सरकारें (राज्यों की) गिरी और बनी हैं, और आगे भी गिर और बन सकती हैं।
एक बार सही मुद्दे का चयन और जनता की संवेदनाओं को झकझोरता हुआ आन्दोलन हो गया, उसके बाद तो केवल फल खाना बाकी रह जाएगा, पर यह काम भी मोदी को विश्वनाथ प्रताप सिंह की स्टाइल में ही करना होगा। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री पद इस तरह लिया था जैसे देश पर कोई एहसान कर रहे हों। मोदी को भी ऐसा ही करना होगा।