Saturday, May 26, 2018

शिवपालगंज की सैर

जिन्होंने श्रीलाल शुक्ल जी की 'राग दरबारी' पढ़ रखी हो, वही इसे पढ़ें। बाकी लोगों से इतना लम्बा लेख लिखने के लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ।
शिवपालगंज की सैर
कुछ दिन पहले अखबार में पढ़ा कि (स्वर्गीय) श्रीलाल शुक्ल के अमर ग्रंथ 'राग दरबारी' के प्रकाशन के 50 वर्ष पूरे हो गये। पढ़ कर दिमाग बरबस ही उस दिन की ओर चला गया जब पहली बार यह पुस्तक मुझे पढ़ने को मिली थी। मुझे अच्छी तरह याद है: जून 1981 की बात है; किताब मैंने रात 10 बजे के आसपास पढ़नी शुरू की, और सुबह सात बजे पढ़ कर खत्म कर दी। यही नहीं, अगले दिन फिर उसे पढ़ना शुरू किया, और इस बार धीरे-धीरे रस लेकर पढ़ा। तब से लेकर आज तक न जाने कितनी बार-कई बार यूँ ही बीच में कहीं से भी और कहीं तक, राग दरबारी पढ़ चुका हूँ, और न जाने कितने लोगों को पढ़ा चुका हूँ। जितने लोगों को मैंने राग दरबारी की प्रतियाँ भेंट कीं, सभी ने बाद में कृतज्ञता-ज्ञापन किया। आज भी गाहे-बगाहे विद्वानों के बीच 'राग दरबारी' के उद्धरण सुनाकर मैं गर्व और आनंद का अनुभव करता हूँ। अन्य किसी पुस्तक के लिए इस तरह की दीवानगी मेरे मन में नहीं है। दरअसल अपने अनेक मित्रों की तरह मेरी साहित्यिक अभिरुचि भी राग दरबारी से शुरु होकर राग दरबारी पर ही समाप्त हो जाती है। मुझे गर्व है कि मैंने राग दरबारी पढ़ रखी है। राग दरबारी के प्रकाशन के 50 वर्ष पूरे होने के समाचार ने मस्तिष्क को इस प्रकार के विचारों से ओतप्रोत कर दिया, और रंगनाथ, वैद्यजी, रामाधीन भीखमखेड़वी, बद्री पहलवान, प्रिंसिपल साहब, खन्ना मास्टर, गयादीन जी, सनीचर, छोटे पहलवान और लंगड़ जैसे कितने ही पात्र दिमाग पर हावी हो गये। दिमाग उन वास्तविक पात्रों के बारे में सोचने लगा जिनसे जीवन में भेंट हुई जो सीधा 'राग दरबारी' से ही निकले जान पड़ते थे। तभी एक विचार आया कि क्यों न शिवपालगंज चल कर देखा जाय कि इन पात्रों में से कितने जीवित हैं, इनके बाल-बच्चे क्या कर रहे हैं, और शिवपालगंज खुद इन पचास सालों में कितना विकसित हो गया है।
यह शिवपालगंज आखिर है कहाँ? शुक्ल जी ने इस सम्बंध में कुछ संकेत दिये हैं। उन्होंने लखनऊ के देहाती और शहरी रिक्शेवालों का ज़िक्र किया है। बद्री पहलवान एक बार अपने संदूक के साथ रिक्शे पर बैठकर शिवपालगंज आये थे जिसे एक शहरी रिक्शेवाला खींच रहा था, और उसने बातचीत में लखनऊ के माल अवेन्यू और फ्रैम्प्टन स्क्वायर मुहल्लों का ज़िक्र किया था। इसके अतिरिक्त शुक्ल जी ने एक संकेत और दिया है: शहर का किनारा; उसे छोड़ते ही देहात का महासागर शुरू हो जाता था। फिर रंगनाथ का ट्रक ड्राइवर से कहना: पंद्रहवें मील पर उतर पड़ेंगे। इन बातों का विचार करके मैंने अपनी कार से ही शिवपालगंज को ढूँढने का निश्चय किया। जहाँ शहर खत्म हो जाय, उसके बाद पंद्रह मील अथवा 20-22 किमी पर कहीं शिवपालगंज होना चाहिये, यह सोचकर एक दिन अच्छा मौसम और शुभ मुहूर्त देखकर मैंने अपनी यात्रा शुरु की। मेरा पहला लक्ष्य था: शहर का किनारा!
अपने आप को रंगनाथ की भूमिका में रख कर मैं शहर के उस छोर को ढूँढ रहा था जहाँ आज से 50 साल पहले रंगनाथ ने एक ट्रक खड़ा देखा था, पर लगभग 40 किमी गाड़ी चला लेने के बाद भी जब शहर का किनारा नहीं दिखा, तो मुझे ध्यान आया कि रंगनाथ की शिवपालगंज-यात्रा को 50 साल बीत चुके हैं, और पहले जहाँ शहर का किनारा रहा होगा, वह जगह अब शहर निगल चुका होगा। मैंने गाड़ी वापस मोड़ी, और इस बार सावधानी से एक-एक साइनबोर्ड देखते हुए धीमी गति से वापस शहर की ओर चलने लगा। अचानक एक साइनबोर्ड पर नज़र पड़ी: दंगनाथ स्टेशनरी ऐंड जनरल स्टोर्स।
गाड़ी रोक कर मैंने दुकान को ध्यान से देखा। दुकान की बनावट किसी रेलगाड़ी के डिब्बे की तरह थी: सामने ज्यादा जगह नहीं थी, पर अंदर पर्याप्त गहराई थी। दुकान को बड़े करीने से दो भागों में बाँट दिया गया था: एक भाग में स्टेशनरी स्टोर था जिसमें मुख्य रूप से इंजीनियरिंग की किताबें और स्थानीय अखबार और पत्र-पत्रिकाएं दिख रही थीं, और दूसरे भाग में जनरल स्टोर चल रहा था जिसमें बिकने वाला मुख्य पदार्थ रंग-बिरंगी बोतलों में बिकने वाला एक पेय था, जिसकी खाली बोतलें बता रही थीं कि वह पेय वहाँ काफ़ी लोकप्रिय था। बीच में एक लड़की जो स्पष्टतया दुकान की मालकिन या मैनेजर थी, किसी स्कूल की यूनीफॉर्म सी पहने बड़ी तल्लीनता से अपने मोबाइल से उलझी हुई थी। दुकान के नाम और दुकान की मालकिन से आकर्षित होकर में गाड़ी से उतर पड़ा और दुकान के सामने जाकर लड़की से पूछा:
"शिवपालगंज किधर पड़ेगा?"
लड़की ने मोबाइल से सिर उठाये बिना आवाज़ लगायी: "छोटे, देखो साहब को क्या चाहिए!"
पहले दंगनाथ, और अब छोटे! मैं समझ गया कि में अपनी मंज़िल के बहुत नज़दीक हूँ। इसी बीच एक दो पन्ने के अखबार पर नज़र पड़ी जिसका नाम था: गंज टाइम्स, और नीचे लिखा था-मास्टर मोतीराम द्वारा स्थापित। खिली हुई बाँछों के साथ मैंने छोटे की ओर रुख किया। छोटे एक दस-बारह साल का लड़का था, जो सिर्फ निकर पहने हुए था और कुछ ग्राहकों को 'ठण्डा' पिलाने में व्यस्त था। मैंने प्यार से उससे कहा:
"बेटा, शिवपालगंज जाना है।"
मेरी ओर देखे बिना छोटे ने जवाब दिया: " तो जाओ, रोका किसने है?"
मैं समझ गया कि यह खालिस गॅंजहा है; मैंने उसे आदर की दृष्टि से देखते हुए एक बार और कोशिश की:
"अरे भाई, में तो शिवपालगंज जाने का रास्ता पूछ रहा हूँ।"
छोटे पर इस प्रेम और आदर का कोई असर नहीं हुआ, और एक बार फिर बिना मेरी ओर देखे ही जवाब दिया: "पूछते रहो; हम यहाँ रास्ता बताने को थोड़े ही बैठे हुए हैं!"
मैंने मदद के लिए लड़की की ओर देखा, पर वह पहले की तरह मोबाइल से ही खेलने में व्यस्त थी। दोबारा छोटे की तरफ देखते हुए मैंने कहा:
"बेटा; गॅंजहापन झाड़ रहे हो!"
छोटे ने अब टेढ़ी निगाह से मेरी तरफ देखते हुए कहा:
"यहाँ जो आता है, गंज का रास्ता पूछते हुए ही आता है!"
इसके बाद उसने भुनभुनाना शुरू किया: "सबको शिवपालगंज जाना है; सालों, हजरतगंज से मन नहीं भरता जो घूमने के लिए शिवपालगंज चले आते हो?"
बालक की विलक्षण प्रतिभा को देखकर मैंने मन ही मन छोटे पहलवान को याद किया, और मुस्कराते हुए एक बार फिर कोशिश की:
"इतना नाराज़ क्यों हो रहे हो पहलवान? गर्मी बहुत है; एक ठण्डा पी लो, और आराम से बताओ।"
"आराम-वाराम शहर के चिड़ीमार किया करते हैं; यहाँ आराम कहाँ? और ठण्डा हम क्यों पियें? ठण्डा तुम पियो; कुछ जेब ढीली करो, तब पता चलेगा शिवपालगंज ठण्डा है कि गरम!"
मैंने लड़की की ओर देखा; वह बिना सर उठाये मुस्कराई। उत्साहित होकर मैंने कहा:
"एक गंज टाइम्स देना।"
"छुट्टे नहीं हैं।" लड़की ने फिर बिना सर उठाये कहा।
"ठीक है, फिर एक ठण्डा ही पिलाओ; पहलवान, तुम भी पी लो; मैडम आप भी लीजिए।"
मैडम ने अब घबरा कर सिर उठाया, और कहा-"नहीं-नहीं, में ठण्डा नहीं पीती; आप छोटे को ही पिलाइए।"
छोटे ने एक बोतल मुझे पकड़ाने के बाद बिना किसी तकल्लुफ़ के एक बोतल खोलकर मुँह से लगा ली, और बातचीत करने के लिए मेरे पास सरक आया, और आत्मीयता के साथ कहने लगा:
"यह शिवपालगंज साला गरीब की जोरू हो गया है; जिसे देखो वही देखने चला आ रहा है! फोकट की फुट्टफैरी! साले आते हैं, और हमारे घरों के पिछवाड़े मूत कर चले जाते हैं; फिर ऊपर से सवाल पर सवाल! सनीचर कहाँ है, बेला का क्या हुआ? क्या लंगड़ को नकल मिली? और जाने क्या-क्या! सब एक से एक बेहया! कितना भी गरियाओ, टलने का नाम नहीं लेते। सब बड़ी-बड़ी गाड़ियों में खाने-पीने के सामान के साथ आते हैं, और कूड़ा हमारे यहाँ फेंक जाते हैं!"
अचानक छोटे ने सुर बदला, और कहा: "अंकल, कुछ खाएंगे आप? एक चिप्स लीजिए।"
इतनी सारी गालियों के बाद छोटे के मुँह से 'अंकल' और 'आप' जैसे शब्द सुनकर मुझे उसी तरह चक्कर आ गया जिस तरह प्रिंसिपल साहब के मुँह से पिकासो का नाम सुनकर रंगनाथ को आ गया था, पर मैंने किसी तरह अपने को लड़खड़ाने से बचाते हुए कहा:
"हाँ-हाँ, क्यों नहीं?"
इतना सुनते ही छोटे ने एक चिप्स का पैकेट खोलकर उसमें से खाना शुरू किया, और फिर से अपने स्थायी भाव पर आ गया।
"इधर तो पता नहीं क्या हो गया है-झुण्ड के झुण्ड लोग चले आ रहे हैं जैसे शिवपालगंज में ही इन सबकी नाल गड़ी हो! शिवपालगंज सबको देखना है, पर शिवपालगंज में रहने वालों से किसी को मतलब नहीं; सब मरे हुए लोगों का हाल जानना चाहते हैं, जिंदा लोगों की कोई कद्र नहीं! बैदजी का क्या हुआ? क्या लौण्डे अब भी अमराइयों में जुआ खेलते हैं? अबे हम क्या जानें बैदजी को, और अमराइयाँ अब कहाँ हैं? किसी से प्यार से बात करने के लिए घर के अंदर बुलाएं, तो ससुरे ऐसे भागते हैं जैसे घर में घुसते ही कोई छूत की बीमारी लग जायेगी; हमारे घर में बैठकर एक लोटा पानी नहीं पी सकते, पर हमारे परबाबा की इनको खबर चाहिए।"
तभी एक दुबला-पतला भला सा दिखने वाला प्रौढ़ आदमी सामने से आता हुआ दिखा; उसे देखते ही लड़की ने कहा: "पापा आ गये।"
'पापा' के कानों में भी छोटे के कुछ वाक्य पड़ चुके थे, इसलिए उन्होंने छूटते ही कहा-क्या बात है छोटू पहलवान? आज बहुत गुस्से में हो!" फिर वह मुझसे मुखातिब हुए, और नमस्कार करते हुए अपना परिचय दिया-
"में दंगनाथ हूँ: रंगनाथ का बेटा।"
खुशी के मारे मेरे हाथ से ठण्‍डे की बोतल छूट गयी, और मैंने भावावेश में उनसे हाथ मिलाते हुए कहा: "अहोभाग्य, जो आपके दर्शन प्राप्त हुए!"
दंगनाथ ने विनम्रतापूर्वक कहा: तो आप भी शिवपालगंज को खोजते हुए आये हैं?! आपका दोष नहीं; शुक्लजी ने उसका वर्णन ही इतना जीवन्त किया है! इधर लोगों की आमदरफ्त काफी बढ़ गयी है, पर अधिकांश लोग जो शिवपालगंज जाते हैं, उन्हें निराश ही होना पड़ता है। लोग 50 साल पहले वाला शिवपालगंज ढूँढते हैं, जो उन्हें नहीं मिलता। शिवपालगंज यहाँ से करीब तीन मील की दूरी पर है; आप जाना चाहें तो में आपको रास्ता बताता हूँ, पर अगर आप कुछ देर मेरे साथ बैठें, तो मैं यहीं बैठे-बैठे आपको वह सारी जानकारियाँ दे सकता हूँ जो आपको चाहिए।"
"क्यों नहीं?" मैंने कहा। "शिवपालगंज मैं जाना तो अवश्य चाहूँगा, पर आपको भी मैं इतनी आसानी से छोड़ने वाला नहीं हूँ। कहीं इतमीनान से बैठ कर लंच करते हैं; इस बीच ज़रूरी बातें भी हो जायेंगी।" पास के एक रेस्तराँ में एक कोने की मेज पर बैठने और खाने का ऑर्डर देने के बाद मैंने बातचीत शुरू की।
-"तो अपने पिताजी से ही शुरू कीजिए; अपनी आत्मा के तारों पर पलायन-संगीत गूँजने के बाद उन्होंने तो शिवपालगंज छोड़ दिया था; फिर आप यहाँ कैसे आये? लेकिन ठहरिए; उससे पहले यह बताइए कि यह छोटे कौन है? क्या इसका छोटे पहलवान वल्द कुसहर प्रसाद से कुछ सम्बंध है?" दंगनाथ हँस पड़ा। "बिल्कुल सही पहचाना आपने; यह छोटे उस छोटे पहलवान का पोता है, और आपके लिए खुशी की बात यह है कि छोटे पहलवान अभी जीवित हैं, और आप उनसे मिल भी सकते हैं।"
"अरे वाह! उनसे तो मैं ज़रूर मिलूँगा, पर अभी आप रंगनाथ से शुरू कीजिए; कहाँ हैं वह आजकल?
"रंगनाथ!" पानी का एक लम्बा घूँट भरने के बाद दंगनाथ ने बोलना शुरू किया: "अभी जीवित हैं, और उतरेटिया के पास अपने पुश्तैनी मकान में अकेले रहते हैं। जीवन में बहुत कुछ देखा, पर चार-छह महीनों के शिवपालगंज-प्रवास में जो कुछ देखा, उसे देखकर दंग रह गये और शायद इसीलिए मेरा नाम उन्होंने दंगनाथ रखा। शिवपालगंज में जो कुछ उन्होंने देखा, आज तक उसी को समझने में लगे हैं। शिवपालगंज से लौटने के बाद वह बहुत चिड़चिड़े हो गये थे और हर किसी से खामखा भिड़ जाते थे। वह अपने गाइड से भी भिड़ गये; उसने सालों झुला कर भी उनकी पीएचडी पूरी नहीं होने दी, और परिणामस्वरूप उन्हें किसी सरकारी कॉलेज में नौकरी नहीं मिल सकी। उनके जीवन में प्रिंसिपल साहब की वह भविष्यवाणी अक्षरशः सत्य हुई जिसमें उन्होंने कहा थथा: 'जहाँ भी जाओगे, तुम्हें किसी खन्ना की ही जगह मिलेगी।' ज़िन्दगी भर अपनी योग्यता की माँग की अपेक्षा नीचे के पदों पर काम करने और अपने से अक्षम व्यक्तियों से अपमानित होने के बाद भी शिवपालगंज ही है जिसने उन्हें प्रसन्न रखा है। आज भी शिवपालगंज को याद करके कभी अकस्मात् हँसने लगते हैं, और कभी रोने भी लगते हैं। प्रिंसिपल साहब की बातों के नये-नये अर्थ निकालना आज भी उनका पसन्दीदा शगल है। उन्हें यह समझने में ही कई साल लग गये कि प्रिंसिपल साहब बात कहीं से शुरू करें, खत्म हमेशा खन्ना मास्टर पर ही करते थे।
वैद्यजी के साथ सम्बन्धों के असहज हो जाने के कारण शिवपालगंज लौटना उनके लिए सम्भव नहीं था, पर शिवपालगंज उनसे अलग कभी नहीं हुआ; वह आज भी शिवपालगंजमय हैं।"
"समझा।" मैंने कहा: "पर आप यहाँ कैसे पहुँचे?
"लम्बी कहानी है।" दंगनाथ ने पानी का एक और लम्बा घूँट लिया। "गयादीन ने बेला की शादी अपना सबकुछ दहेज में देकर उसी शहरी नौजवान के साथ कर दी जो बच्चे कम पैदा करने के फ़ायदे बताने शिवपालगंज आया था। यहाँ से कुछ दूरी पर ही गयादीनजी के दामाद का शॉपिंग मॉल है। नाम भी बेला के नाम पर ही रखा है। आप वहाँ भी जा सकते हैं, पर वहाँ शिवपालगंज का नाम न लीजिएगा। बेला की शादी के बाद बद्री पहलवान कुछ ढीले पड़ गये, और पहलवानी के काम में भी ढिलाई बरतने लगे। इसी बीच उनके एक पालक-बालक ने-वही जिसकी बाम्हन की जोरू के साथ घसड़-फसड़ हो गयी थी, ने बाम्हन का खून कर दिया और फ़रार हो गया। उसके ज़ामिन होने के कारण बद्री पहलवान पुलिस और कानून की लपेट में आ गये, और उन्हें भी उन्नाव की जिला अदालत ने छह महीने के लिए जेल भेज दिया। जेल से छूटने के बाद बद्री पहलवान और भी अनमने से रहने लगे। वैद्यजी ने उनकी शादी कराने की कोशिश की, पर पहलवान एक तो प्रौढ़ हो चुके थे, फिर जेल काट कर आये थे, और बेला से सम्बन्धों की उनकी ख्याति दूर-दूर तक पहुँच चुकी थी। कोई अपनी लड़की उन्हें देने को तैयार नहीं हुआ। जेल हो आने और पहलवानी से बेज़ार हो जाने के कारण उनके सम्पर्क-सूत्र भी उनके हाथों से छूटने लगे, और एक दिन उन्होंने देखा कि वह बाज़ार से बिल्कुल उखड़ चुके हैं। वह बीमार रहने लगे, और उनकी बीमारी से वैद्यजी का साम्राज्य भी लड़खड़ा गया। बाबू रामाधीन भीखमखेड़वी ने मौके का फ़ायदा उठा कर बैजेगाँव के लाल साहब को अपनी ओर कर लिया, और छंगामल इंटर कालेज की मैनेजरी वैद्यजी के हाथ से जाने वाली ही थी कि रामाधीन भीखमखेड़वी को एक नया आइडिया आया। शिक्षा के व्यवसाय में फायदा देखकर उन्होंने छंगामल विद्यालय की मैनेजरी हड़पने के बजाय अपना कालेज खोलने की सोची और वैद्यजी को इस बात के लिए मना लिया कि वह अपने सम्पर्कों का इस्तेमाल रामाधीन के कालेज को मान्यता दिलाने में करें; बदले में वह छंगामल कालेज के मैनेजर बने रह सकते थे। नतीजा है बाबू रामाधीन भीखमखेड़वी कालेज ऑफ़ इन्जीनियरिंग ऐन्ड मैनेजमेंट। रामाधीन के कालेज में बाहर के लड़कों के आ जाने के बाद मार-पीट में भी छंगामल कॉलेज के लड़के पिटने लगे जिससे वैद्यजी का आभामण्डल और प्रभावित हुआ, और लगा जैसे वैद्यजी के साम्राज्य का सूर्य अस्त होने ही वाला है, पर तभी रुप्पन बाबू जिन्हें वैद्यजी ने अपनी विरासत से बेदखल कर दिया था, ने छोटे पहलवान की मदद से पहले छंगामल कॉलेज पर हस्तक्षेप किया, और उसके छात्रों को उत्तम कोटि का शारीरिक प्रशिक्षण और हथियार उपलब्ध कराये जिससे रामाधीन कॉलेज के छात्रों पर युद्ध में उन्हें निर्णायक विजय मिली, और उसके बाद उन्होंने रामाधीन के कॉलेज पर भी हस्तक्षेप करके परिस्थिति को पूर्ण नियंत्रण में ले लिया।" तब तक भोजन सामने आ गया और हम दोनों ही बातचीत रोककर भोजन में लग गये। खाते-खाते मैंने पूछा: "रामाधीन कॉलेज पर रुप्पन बाबू ने कैसे हस्तक्षेप किया?" दंगनाथ मुस्कराया। "भूल गये रुप्पन बाबू का बेला-प्रकरण? रुप्पन बाबू युवा थे; वैद्यजी और बद्री पहलवान थक चुके थे, और उनके साथ रोक-टोक करने वाला कोई था नहीं; अवसर का लाभ उठाकर उन्होंने रामाधीन कॉलेज की एक मास्टरनी के साथ प्रेम की पींगें बढ़ाना शुरू किया जो रामाधीन भीखमखेड़वी की रिश्तेदार थी; बात खुल जाने पर उन्होंने उसके साथ शादी भी कर ली। वैद्यजी ने इस विवाह के लिए उसी प्रकार सहर्ष स्वीकृति दी जिस प्रकार आचार्य चाणक्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस की कन्या हेलेन के विवाह की स्वीकृति दी थी क्योंकि यह विवाह भी केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं दो साम्राज्यों के बीच था। इस विवाह का तात्कालिक प्रभाव यह हुआ कि दोनों कॉलेजों के छात्रों में लड़ाई-झगड़े हमेशा के लिए बंद हो गये, और रुप्पन बाबू रामाधीन इंजीनियरिंग कॉलेज की मैनेजिंग कमिटी के भी सदस्य हो गये। वैद्यजी ने भी शुभ मुहूर्त देखकर एक दिन छंगामल कॉलेज की मैनेजरी भी रुप्पन बाबू को सौंप दी, और रुप्पन बाबू ने वैद्यजी की जगह पूरी तरह से ले ली। वैद्यजी एक व्यक्ति नहीं एक संस्था है: वैद्यजी थे, हैं, और रहेंगे!"
तब तक खाना खत्म हो चुका था; हाथ धोने के बाद हमने कॉफी का ऑर्डर दिया, और बातचीत फिर शुरू हुई।
"दिलचस्प!" मैंने कहा: "पर आप यह बता रहे थे कि आप यहाँ कब और कैसे आये।"
लंबे मौन के बाद दंगनाथ ने फिर कहना शुरू किया:
"ह्म, मैं यहाँ कैसे आया?!" कॉफ़ी के घूँट भरते हुए दंगनाथ ने बात को जैसे तौलते हुए आगे बोलना शुरू किया: "पिताजी तो शिवपालगंज आने के बाद शिवपालगंजमय हो गये थे, पर उन्होंने वैद्यजी और बद्री पहलवान से सम्बंध खराब कर लिए थे, इसलिए चाहते हुए भी उनकी दोबारा शिवपालगंज आने की हिम्मत नहीं हुई। उनकी इच्छा भी रही होगी कि में भी शिवपालगंज देखूँ, पर परिस्थितियाँ भी कुछ ऐसी बनीं कि मुझे यहाँ आना पड़ा, और मैं एक बार आया तो यहीं का होकर रह गया। एमए करने के बाद जब मुझे भी कोई नौकरी मिलने के आसार नहीं दिखे, तो पिताजी ने मुझे भी रिसर्च करने की सलाह दी; यही नहीं, उन्होंने मुझे अपने इंडॉलोजी के प्रॉजेक्ट को ही आगे बढ़ाने की सलाह भी दे डाली जिस पर उन्हें कई सालों के अथक परिश्रम के बाद भी डॉक्टरेट नहीं मिल सकी। बेचारे ज़िंदगी भर लंगड़ को न्याय दिलाने के लिए कॉफ़ीहाउसों और गोष्ठियों में लेक्चर देते रहे, पर कब वह खुद लंगड़ बन गये उन्हें पता ही नहीं चला। न जाने कितनी बार वह अपनी थीसिस लेकर गाइड के पास गये, पर गाइड हर बार उसमें कोई न कोई कमी बताकर उन्हें उसी तरह लौटा देता था जिस तरह नकलनवीस लंगड़ की दरख्वास्त में कमियाँ निकालकर उसे लौटा देता था। एक दिन थक-हार कर वह बैठ गये: पता नहीं लंगड़ का क्या हुआ होगा! अब वह चाहते थे कि उनका काम मैं आगे बढ़ाऊँ। शायद लंगड़ का लड़का भी इसी तरह तहसील के धक्के खा रहा होगा! पीएचडी के प्रति मन में कोई उत्साह न होने के बावजूद पिताजी की इच्छा का मान रखने के लिए मैंने भी विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रेशन करा लिया, और पिताजी की लिखी थीसिस लेकर गाइड जो शायद पिताजी के गाइड का ही लड़का या कोई रिश्तेदार हो, के आगे-पीछे घूमना शुरू किया। गाइड हर बार उसमें कोई कमी बताता था, और हर बार मैं थीसिस में बिना हेर-फेर किये फिर उसके पास पहुँच जाता था। गाइड की इतनी तारीफ तो करनी पड़ेगी कि वह हर बार उसमें नयी-नयी कमियाँ निकालता था! गाइड और स्कॉलर दोनों अपनी-अपनी रस्मों का पालन कर रहे थे: रिसर्च चल रहा था। मामला बिल्कुल आगे न बढ़ते देखकर पिताजी को शिवपालगंज की याद आयी। तब तक रुप्पन बाबू वैद्यजी की जगह स्थापित हो चुके थे। पिताजी के उनसे सम्बंध काफी अच्छे थे, और उसी सम्बंध का फायदा उठाकर पिताजी ने रुप्पन बाबू से उसी छंगामल विद्यालय में मास्टरी के लिए मेरी सिफारिश की, जिसमें वह खुद कभी नहीं जा सकते थे। छंगामल इंटर कॉलेज उसी साल छंगामल महाविद्यालय बना था जिसमें एमए तक की पढ़ाई शुरू हो रही थी; उन्हें भी मास्टरों की ज़रूरत थी, और रुप्पन मामा की कृपा से वहाँ मुझे नौकरी मिल गयी। दिन में दो लेक्चर लेता हूँ, कॉलेज का कुछ हिसाब-किताब देख लेता हूँ, और यहाँ में रोड पर एक दुकान खोल ली है, उसे भी सँभालता हूँ; दिन कट रहे हैं।"
"ओह!" मैंने कहा: "अच्छा; वैद्यजी और बद्री पहलवान का क्या हुआ? क्या यह लोग अभी हैं?"
"नहीं। वैद्यजी ने तो अपने सामने रुप्पन बाबू को सबकुछ सँभालते और अपने साम्राज्य को अक्षुण्ण होते देख लिया था और जीवन से पूर्ण सन्तुष्ट थे; ऊपर से सनीचर जैसा सेवक उनके पास था; वह तो पूर्णायु होकर शान्ति के साथ मरे, पर बद्री पहलवान इतने भाग्यशाली नहीं थे। बेला-काण्ड के कारण रुप्पन बाबू ने उनको कभी माफ़ नहीं किया और मौके-बेमौके उनको जली-कटी सुनाया करते थे; रही-सही कसर उनकी 'हेलेन' ने पूरी कर दी, जिसने आने के बाद उनको घर के एक कोने में सीमित कर दिया। पहलवानों के बारे में ऐसे भी सुना है कि उनका बुढ़ापा बहुत कष्ट में बीतता है। बद्री पहलवान घर के एक कोने में पड़े-पड़े रुप्पन बाबू और अपने उस पालक-बालक जिसके कारण उन्हें जेल-यात्रा करनी पड़ी थी, को कोसते-कोसते और उनपर कलाजंग दाँव लगाने का संकल्प लेते-लेते एक दिन दादा दूरबीन सिंह की तरह शिवपालगंज की धरती को वीर-विहीन बनाते हुए अपने समय से काफ़ी पहले ही टें हो गये।" "और रामाधीन भीखमखेड़वी? उनका क्या हुआ?" "बाबू रामाधीन भीखमखेड़वी ज़िंदगी भर वैद्यजी से लो इन्टेन्सिटी कनफ्लिक्ट में उलझे रहे, और रुप्पन बाबू के विवाह के उपरान्त वैद्यजी से उनकी दोस्ती हो गयी जिसके बाद पहली बार उन्हें जीवन में शान्ति का अनुभव हुआ। वह अक्सर वैद्यजी के पास बैठते थे और उनके बीच लम्बी चर्चाएं होती थीं। वह भी सुक़ून से गये। उनकी अंतिम कविता मानो विश्व को शान्ति का संदेश देने के उद्देश्य से ही लिखी गयी थी:
'क्या मिला भीखमखेड़वी ताज़िंदगी लड़ कर?
जब दोस्ती हुई तो जाकर सुकूँ मिला!'
"क्या कहने हैं!" मैं अपने को दाद देने से नहीं रोक सका। "और सनीचर का क्या हुआ? और प्रिंसिपल साहब? उनका क्या हुआ?"
-"वैद्यजी के मरने के बाद सनीचर का मन शिवपालगंज से उचट गया। सुना है वैद्यजी ने अपनी वसीयत में उसके नाम कुछ रकम छोड़ी थी; एक दिन अचानक रुप्पन बाबू से छुट्टी और वह रकम लेकर सनीचर शिवपालगंज से गया तो फिर नहीं लौटा।" -"और ग्राम प्रधान? सनीचर के बाद ग्राम कौन बना?" -"रामाधीन के भइया; और कौन? दोनों परिवारों के बीच सम्बंध स्थापित हो जाने के बाद प्रधानी का कोई झगड़ा ही न रहा।" -"और प्रिंसिपल साहब?" -"प्रिंसिपल साहब समय से रिटायर हो गये, यद्यपि रुप्पन बाबू के मैनेजर बनने के बाद उनको कुछ दिक्कतें हुईं, पर अपने अनुभव और वैद्यजी के आशीर्वाद के सहारे वह अपने दिन काट ले गये; आज भी वह कॉलेज की मैनेजिंग कमिटी के मेम्बर हैं। खन्ना मास्टर और मालवीय जी के कॉलेज छोड़ने के बाद प्रिंसिपल साहब ने कॉलेज को अपने चचेरे-ममेरे भाइयों से भर दिया, पर उन्हीं मास्टरों ने खन्ना मास्टर की परम्परा में एक प्रिंसिपल-विरोधी गुट बना लिया जिसे सुना था कि रुप्पन बाबू का आशीर्वाद प्राप्त था। गुटों में किचकिच चलती रही, पर प्रिंसिपल साहब किसी तरह पार हो गये।"
-"और गयादीन?"
-"गयादीन? उनका क्या होना था? जोगनाथ वाले मामले में कोर्ट में छोटे पहलवान की बेला को लेकर दिये गये बयान के बाद गयादीनजी की जो बदनामी हुई, वह उनके लिए असह्य थी। इसे लोकापवाद नहीं तो और क्या कहा जाएगा? जिस आदमी ने कभी चींटी तक नहीं मारी, जिसने घर में हुई चोरी को भगवान की मर्जी मान कर स्वीकार कर लिया था, उसके दुनिया के सामने कपड़े उतार दिये गये। गयादीन ने अगर आत्महत्या नहीं की, तो इसलिए नहीं कि वह कायर थे, बल्कि इसलिए कि उनके खानदान में किसी ने आत्महत्या नहीं की थी। बेला की बदनामी को ढकने के लिए उसकी शादी में गयादीनजी को अपनी भैंस तक बेचनी पड़ी, और बेला की विदाई के बाद भी शिवपालगंज में रहना उनके लिए असम्भव हो गया। अपनी सारी जायदाद बेचकर रायबरेली रोड पर उन्होंने एक दुकान खरीदी, और वहाँ नये सिरे से धन्धा शुरू किया। आज भी वह उड़द की दाल से परहेज करते हैं, पर शिवपालगंज का नाम सुनते ही गुस्सा होने से अपने को रोक नहीं पाते। यही हाल बेला और उसके पति का है। शिवपालगंज का नाम सुनते ही वह चुप हो जाते हैं।"
इन महापुरुषों का हाल जानने के बाद मैं तृप्त हो गया। अब बस छोटे पहलवान से मिलना बाकी था। मैंने अब दंगनाथ से कहा: "तो अब शिवपालगंज चला जाय?"
थोड़ी ही देर में हम शिवपालगंज की धरती पर थे। मैंने गाँव की मिट्टी को माथे पर लगाया और दंगनाथ के साथ छोटे पहलवान के घर जाकर उनका दरवाजा खटखटाया।
"कौन है बे?" अन्दर से आवाज़ आयी। छोटे की आवाज़ पहचान कर मैं मन ही मन मुस्कराया।
"मैं दंगनाथ।" दंगनाथ ने उतनी ही तेज़ आवाज़ में जवाब दिया।
"कौन दंगनाथ? बाप का नाम?"
"छोटे, गँजहापन मत झाड़ो; चुपचाप दरवाजा खोलो। तुम्हारे दादा से कोई मिलने आये हैं।"
शायद मेरे पिलाये ठण्डे को याद करके छोटे ने दरवाजा खोल दिया। सामने ही एक आरामकुर्सी पर कमर में लुंगी बाँधे नंगे बदन घुटे सिर और लम्बी मूँछों वाले एक बुजुर्ग व्यक्ति बैठे हुए थे, जो काफ़ी कमजोर दिख रहे थे, पर उनके शरीर की बनावट उनके जवानी में पहलवान होने का इतिहास बयान कर रही थी। पीछे दीवार पर एक पुरानी फोटो जिस पर हार चढ़ा हुआ था, और जिसमें एक व्यक्ति घुटा सिर, लम्बी मूँछ, कुर्ता, लुंगी और बूट धारण किये हुए चन्द्रशेखर आज़ाद स्टाइल में अपनी मूँछें उमेठता हुआ दिख रहा था। मैं समझ गया कि वह बद्री पहलवान के अलावा कोई दूसरा नहीं हो सकता। दंगनाथ ने झुक कर छोटे पहलवान के पैर छुए, तो मैंने उन्हें साष्टांग दण्डवत किया। छोटे पहलवान ने झुक कर मुझे उठाने की कोशिश की, तब मैंने गौर किया कि उनका एक हाथ स्लिंग में झूल रहा था, और उनके माथे पर एक घाव था जिस पर हल्दी का लेप लगा हुआ था।
छोटे पहलवान मेरा भक्तिभाव देखकर काफ़ी प्रसन्न हुए, और मेरी ओर देखते हुए बोले: "तुम आदमी ठीक जान पड़ते हो, पर तुम्हारी तंदुरुस्ती कुछ ढीली है।" फिर तुरंत ही वह दंगनाथ से मुखातिब हुए: "और तुम्हारे क्या हाल हैं दंगनाथ? चाय-वाय पियोगे?" दंगनाथ को जवाब देने का मौका दिये बिना वह कहते रहे: "पहिले के ज़माने में घर आये मिहमान का बादाम मिले दूध से स्वागत होता था, अब तौ ससुरी चाय मिल जाय वही बहुत है। बद्री गुरु के अखाड़े पर शुरू-शुरू में हम लोगों को गुड़-चने के साथ बादाम मिला दूध पिलाया जाता था, तब जाकर भूत जैसी ताकत देह में आती थी; आजकल वहाँ भी चाय-बिस्कुट खिलाया जा रहा है; ज़माने का हाल बुरा है!" "हम तो बिल्कुल फिट हैं चचा! दंगनाथ ने जवाब दिया: "अपनी सुनाइए; यह चोट कैसे लगी? क्या फिर जगेसर दादा से आपकी लड़ाई हुई? दादा हैं कहाँ?" में तुरन्त समझ गया कि जगेसर दादा छोटे पहलवान के सुपुत्र का नाम है; एक क्षण में छोटे पहलवान के खानदान की विशिष्ट परम्परा जिसमें बेटा बालिग होते ही बाप की धुनाई शुरू कर देता था, और कुसहर प्रसाद से लेकर बाबा भोलानाथ तक के छोटे पहलवान के पूर्वजों के नाम दिमाग में कौंध गये।
"अरे नहीं; उसने तो मुझे पीटना कब का बंद कर दिया। वैसे भी आजकल के लौंडों में वह दम कहाँ? भरी जवानी माँझा ढील! एक हम थे जो सोलह साल की कच्ची उमर में ही अपने बाप कुसेहर प्रसाद को उठा कर पटक देते थे; जगेसरा के हाथ में अगर लाठी न हो, तो वह आज भी मुझे नहीं हरा सकता। यह चोट तो इस छोटे पहलवान की वजह से लगी है।" उन्होंने हँस का अपने पोते की ओर इशारा किया जो तुरन्त ही शरमा कर वहाँ से हट गया। छोटे पहलवान कहते रहे: "दिन भर टीवी पर डब्लूडब्लूयफ देखता रहता है और सब मेरे ऊपर आजमाता है, बाद में अपने बाप को उसी तरह पटकेगा।" यह कह कर छोटे पहलवान ठठाकर हँस पड़े। छोटे पहलवान का अपनी वंश-परम्परा के प्रति गर्व और समर्पण देखकर मैंने मन ही मन उनका नमन किया। पहलवान कहते रहे: पहले हर साल पचैयाँ पर कुश्ती के मुकाबले होते थे। एक बार हमारे गाँव में पता नहीं कहाँ से एक पहलवान आया: बिल्कुल काला भुजंग, नौगजा पीर जैसा; उसने आकर पूरे गाँव को चुनौती दे दी। भीखमखेड़ा के कल्लू पहलवान को उसने हँसी-हँसी में धोबीपाट दाँव से चित्त कर दिया था। बद्री वस्ताद उस दिन कहीं बाहर गये थे, और किसी की अखाड़े में उतरने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी। मेरी अभी मसें भी नहीं भीगी थीं, पर अपने बाप को मैं पटकने लगा था। ऐसे में बैद महराज ने मजबूर होकर मेरी तरफ देखा। मैंने मन ही मन लाल लँगोटी वाले और अपने बद्री वस्ताद को याद किया, और अखाड़े की मिट्टी माथे पर लगा कर अखाड़े में उतर पड़ा। पहलवान ने पहले मेरे ऊपर जाँघिया दाँव लगाने की कोशिश की, पर मैं किसी तरह उसका हाथ अपने लँगोट उसके हाथ में आने से बचाता रहा। उसने मुझ पर धोबीघाट आजमाने की कोशिश की, पर मैं निकाल दाँव खेलकर उसकी टाँगों के बीच से निकल गया। अगर वह उतना भारी-भरकम न होता तो मैंने उसे कन्धे पर उठाकर पटक दिया होता, पर साला बहुत भारी था। थोड़ी देर जोड़ करने के बाद उसकी कलाई मेरे हाथ में आयी; मैंने तुरन्त साँडीतोड़ दाँव लगाया। वह दर्द से बिलबिला उठा। मैं मौका देखकर उसकी टाँगों के बीच से निकला, और बिना उसका हाथ छोड़े ही बैठे-बैठे ही मैंने उसे उलट दिया। दर्द के मारे वह खुद ही चित्त हो गया।बैद महराज ने खुश होकर मुझे गले से लगा लिया, और साल भर अपने घर से मेरे लिए रोजाना चार सेर दूध भिजवाने का एलान किया, जिसमें से आधा हमारे बाप पी जाते थे।"
तभी छोटे चाय लेकर आ गया। चाय के दौरान पहलवान ने दूसरा किस्सा शुरू किया जिसमें उन्होंने बद्री पहलवान को काँखी दाँव में उलझा लिया था, पर वस्ताद होने का लिहाज करते हुए चित नहीं किया था। दंगनाथ यह सब शायद पहले भी सुन चुका था; चाय खत्म होते ही उसने चलने के लिए छोटे पहलवान से आज्ञा माँगी। पहलवान ने मेरी ओर देखते हुए कहा: "कभी इन्हें लेकर अखाड़े पर आओ।"
-"ज़रूर; क्यों नहीं चाचाजी!" दंगनाथ ने छोटे पहलवान के पाँव छूते हुए कहा।
मैंने छुटकू पहलवान के हाथ में सौ रूपये का एक नोट रखा जिसे उसने इस तरह लपका जैसे छिपकली अपना भोजन लपक लेती है। मैंने दोबारा छोटे पहलवान को दण्डवत प्रणाम किया और हाथ जोड़े-जोड़े दंगनाथ के साथ घर से बाहर निकल गया। मन ही मन मैं उस मुकदमे के बारे में सोच रहा था जो कुसहर प्रसाद ने अपने पुत्र छोटे पहलवान के खिलाफ़ किया था, कि दंगनाथ ने कहा: "रुप्पन बाबू से नहीं मिलेंगे?"
वापस वर्तमान में आते हुए मैंने खुश होकर कहा: "क्यों नहीं?"
"पर ध्यान रहे!" दंगनाथ ने सावधान किया: "आज के रुप्पन बाबू में ५० साल पहले के रुप्पन बाबू को न ढूँढने लग जाइएगा, वर्ना आप निराश तो होंगे ही, आपकी बेइज्जती भी हो सकती है। रुप्पन बाबू अब छात्र-नेता नहीं, पूरे नेता हैं और वैद्यजी के तख़्त पर विराजमान हैं। वैद्यजी के अलावा वह रामाधीन भीखमखेड़वी का भी साम्राज्य सँभाल रहे हैं। उनके पास अब टाइम कहाँ है? जैसे छोटे पहलवान के यहाँ चुपचाप रहे, वैसे ही रुप्पन बाबू के यहाँ भी रहिएगा।"
जल्द ही हम बैठक के सामने थे। बाहर दो बन्दूकधारी गार्ड खड़े थे, जो दंगनाथ को पहचानते थे। बिना रोकटोक के हम अंदर पहुँच गये।
अंदर जो देखा उससे आँखें चौंधिया गयीं। वैद्यजी का दरबार लगा हुआ था। बीच में एक तख़्त पर जिसपर एक गद्दा बिछा हुआ था, एक गावतकिये के सहारे रुप्पन बाबू आधे बैठे और आधे लेटे थे। उनका मुँह पान से भरा हुआ था, और पान की पीक बंद मुँह से भी बाहर की ओर झाँक रही थी। एक आदमी उनके पैर दबा रहा था और दूसरा उनका हाथ। लोग एक-एक करके आ रहे थे और रुप्पन बाबू के चरण छूकर हाथ जोड़े हुए अपनी बात कह रहे थे। रुप्पन बाबू किसी की बात का जवाब न देकर बगल में खड़े एक आदमी को इशारा भर कर रहे थे जो उनके हर इशारे पर अपनी नोटबुक में कुछ लिखता जा रहा था। एक कोने में एक नौजवान पूरी ताकत से भंग पीसने पर लगा हुआ था। उसने अचानक सिल के चारो ओर से भंग को समेत कर सिल के बीच में उसे इकठ्ठा किया, और बट्टे को उसपर रख कर बट्टे के सहारे सिल को उठा लिया। प्रभु का यह चमत्कार देखकर कुछ गँजहे खुश होकर तालियाँ बजाने लगे। नौजवान ने पीसी हुई भंग का एक गोला बनाया और उसे एक भगोने में शिवलिंग के आकर में रखकर शिव-शिव करते हुए पानी मिले दूध से उसका अभिषेक करना शुरू किया; गँजहे और खुश होकर तालियाँ पीटने लगे, तभी दंगनाथ ने रुप्पन बाबू के पास पहुँच कर उनके पाँव छुए। रुप्पन बाबू ने पास खड़े एक युवक को इशारा किया जिसने तुरंत पीकदान उनके आगे कर दिया। पान थूककर रुप्पन बाबू बोले: "कैसे हो दंगनाथ? आज किसे साथ लाये हो?"
दंगनाथ ने मेरा परिचय कराया: "आप लखनऊ से शिवपालगंज देखने आये हैं; मैंने सोचा आपसे भी मिलवा दूँ।"
-"तुमने सोचा तो ठीक ही सोचा होगा।" रुप्पन बाबू ने मुस्करा कर कहा और उसी मुद्रा में मेरी ओर दृष्टि डाली; -"तो देख लिया आपने भी शिवपालगंज? क्या देखा?"
जवाब देने की कोशिश में मैं हकलाने लगा। यह देखकर रुप्पन बाबू अकस्मात् हँस पड़े।
-"दरअसल आप लोग शिवपालगंज को देखने-समझने नहीं, शिवपालगंज वालों पर हँस कर अपना मनोरंजन करने आते हैं! कभी-कभी तो श्रीलाल शुक्ल जी के ऊपर गुस्सा भी आता है; शिवपालगंज का नाम उन्होंने पूरी दुनिया में मशहूर तो कर दिया, पर इसका वर्णन इस तरह किया है जैसे हम सब सिर्फ़ जोकरई करने के लिए ही पैदा हुए हैं। इस जोकरई के पीछे की जो मजबूरियाँ हैं, उसे कोई-कोई ही देख पाता है! 'राग दरबारी' कोई मामूली सटायर नहीं-एक चीख है, जो अभी तक उसी तरह गूँज रही है।" रुप्पन बाबू के मुँह से इतनी गम्भीर बात सुनकर मेरी तो फूँक सरक गयी। मेरी हालत देखकर रुप्पन बाबू दोबारा हँस पड़े, और वातावरण को हल्का करने के लिए हँसते-हँसते ही बोले: "पूरा शिवपालगंज ही वेदना का मेटाफ़र है! कुछ याद आया?"
इसके बाद मुझे लगा जैसे रुप्पन बाबू ने मुझे आँख मारी-या शायद सच में ही उन्होंने ऐसा किया! इसके बाद वह बोले:
"आप तो जानते ही हैं हमारी शिक्षा-पद्धति खराब है! वह केवल 'राग दरबारी' पढ़ने भर की ही तमीज़ सिखाती है, उसे समझने की नहीं।
मैं भकुआ जैसा मुँह बाये रुप्पन बाबू की बातों का अर्थ निकालने की कोशिश करता रहा। रुप्पन बाबू बोले: "अभी तो मुझे कहीं जाना है; अपना पता और मोबाइल नंबर दंगनाथ को दे जाइए; किसी दिन इत्मीनान से आइए, तो इस पर बात हो कि शिवपालगंज को कैसे देखा जाय! और हाँ; शरबत पीकर जाइएगा।" तभी भंग पीसने वाले कलाकार ने भंग का गिलास रुप्पन बाबू के आगे बढ़ाया, उसे एक साँस में पीकर रुप्पन बाबू बाहर निकल गये।
शिवपालगंज को समझने के लिए गँजहों की तरह भंग पीने को आवश्यक जानकर मैंने बिना किसी संशय के मैंने भी शरबत का एक गिलास लिया और एक ही साँस में उसे खाली कर के सिर उठाने के बाद मैंने देखा कि दंगनाथ भी ऐसा ही कर रहा था। उसके बाद हम दोनों भी बाहर निकल गये।
थोड़ी देर तो वातावरण गम्भीर रहा, फ़िर मैंने बात शुरू की। "सबकी बात हो गयी, या कोई बचा है? जोगनाथ? पं राधेलाल?"
दंगनाथ भी हँस पड़ा। "आपकी याददाश्त की दाद तो देनी पड़ेगी। आपको यह सब भी याद हैं! सनीचर के जाने के बाद उसकी दुकान पर जोगनाथ ने कब्ज़ा कर लिया; दूकान का सारा सामान बेचकर वह दारू पीने के एकसूत्रीय कार्यक्रम में लगा है; आज भी दारू की मात्रा में कोई अंतर नहीं आने देता, और सर्फ़री बोली बोलता है। और पण्डित राधेलाल! उनका चेला बैजनाथ-अरे वही जिसने जोगनाथ की ओर से गयादीन के यहाँ चोरी वाले मामले में गवाही दी थी: उनकी घरवाली जो उसके पहले उनके साथी चौकीदार की घरवाली थी, को लेकर भाग निकला, और उसके बाद पण्डित राधेलाल भी कहीं भाग निकले।" मोबाइल में समय देखते हुए दंगनाथ ने आगे कहा: "काफ़ी देर हो गयी; अब आप मुझे अपनी दुकान पर छोड़ दीजिए, जिसकी ऊपरी मंज़िल पर मैं रहता हूँ; वहाँ मैं आपको एक कप चाय पिलाऊँगा, उसके बाद आप भी वापस जा सकते हैं।"
चाय पीते-पीते मैंने दंगनाथ से कहा: "आपके पिताजी कुछ महीने शिवपालगंज में रहे, और उन्होंने राग दरबारी लिख डाली; आप इतने सालों से यहाँ हैं, आप उसकी उत्तरकथा क्यों नहीं लिखते?"
दंगनाथ हँस पड़ा: "आप बहुत बड़ी भूल कर रहे हैं। 'राग दरबारी' रंगनाथ ने नहीं- श्रीलाल शुक्ल जी ने लिखी थी। दरअसल 'राग दरबारी' लिखने के लिए शिवपालगंज आना भी ज़रूरी नहीं है; शुक्ल जी ने लिखा भी है- 'जो यहां है वही सब जगह है, और जो यहाँ नहीं है, वह कहीं नहीं है!' रुप्पन बाबू ने भी कहा था: 'मुझे तो लगता है दादा पूरे मुल्क में शिवपालगंज ही फैला हुआ है!' 'राग दरबारी लिखने के लिए चाहिए श्रीलाल शुक्ल जी की पैनी दृष्टि, जो मुझमें तो नहीं है, पर मुझे लगता है आपमें है, तो आप ही लिख डालिए 'राग दरबारी' का सीक्वल। मुझसे जो मदद हो सकेगी, मैं करूँगा।"
मन ही मन मैंने श्रीलाल शुक्ल जी को एक बार और श्रद्धा-सुमन अर्पित किये। मैं समझ गया कि 'राग दरबारी का सीक्वल लिखना मेरे बस की बात नहीं, पर दंगनाथ से मैंने कहा: "अभी तो मेरे पास फुरसत नहीं, रिटायरमेंट के बाद सोचूँगा।"
दंगनाथ बिना कहे ही मेरे मन की बात समझ गया, और ठठा कर हँस पड़ा।
इसके बाद हमने एक दूसरे से विदा ली, और मैं वापस लखनऊ की ओर चल पड़ा।

Wednesday, June 28, 2017

अर्जुनविषादयोग

अर्जुनविषादयोग

श्रीमद्भगवद्गीता को योग का सम्पूर्ण ग्रंथ कहा जाता है जिसके हर अध्याय में एक योग का वर्णन है। गीता के प्रत्येक अध्याय का समापन ‘ऊँ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अमुकयोगो नाम अमुकोSध्यायः’ के संदेश के साथ हुआ है। उदाहरण के लिये दूसरे अध्याय के अंत में लिखा है: ऊँ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोSध्यायः। प्रत्येक अध्याय के अंत में लिखे इसी प्रकार के वाक्यों के आधार पर विभिन्न अध्यायों के नामकरण विभिन्न योगों के नाम पर किये गये हैं। इस प्रकार गीता में तृतीय अध्याय से आगे वर्णित योगों के नाम हैं: कर्मयोग, ज्ञानयोग, कर्मसन्यासयोग, आत्मसंयमयोग, ज्ञानविज्ञानयोग, अक्षरब्रह्मयोग, राजविद्याराजगुह्ययोग, विभूतियोग, विश्वरूपदर्शनयोग, भक्तियोग, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग, गुणत्रयविभागयोग, पुरुषोत्तमयोग, दैवासुरसम्पद्विभागयोग, श्रद्धात्रयविभागयोग एवं मोक्षसन्यासयोग।
प्रथम अध्याय में वर्णित योग का नाम है: अर्जुनविषादयोग। इस अध्याय का कथ्य केवल इतना है कि युद्ध आरंभ करने से पहले अर्जुन ने श्रीकृष्ण से अनुरोध किया कि वह उसके रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में ले चलें जिससे वह उन सभी लोगों को देख सके जिनसे उसे युद्ध करना था, और यह देखकर कि युद्ध की इच्छा लिये हुए मरने-मारने को तैयार कौरव-सेना में उसके बन्धु-बांधव और पूज्य आचार्य लोग ही थे, उसका शरीर काँपने लगा, धनुष उसके हाथ से छूटने लगा, और वह खड़ा होने में भी असमर्थ होकर युद्ध न करने का निश्चय करके रथ के पिछले भाग में बैठ गया। अर्जुन को विषाद हुआ, जिसके नाम पर इस अध्याय का नाम पड़ा: अर्जुनविषादयोग। सवाल उठता है कि यह कौन सा योग हुआ? क्या बलवान शत्रु या शत्रुपक्ष में अपने सुहृज्जन को देखकर घबरा कर बैठ जाना भी कोई योग है? क्या इस योग के अभ्यास से भी किसी तत्त्व की प्राप्ति होती है? इस लेख में इन्हीं प्रश्नों के उत्तर ढूँढने का प्रयास किया जायेगा।
सब से पहले तो इस पर विचार करें कि युद्ध के आरंभ से पहले अर्जुन ने अपने विरोधियों को देखने के उद्देश्य से भगवान श्रीकृष्ण को रथ को सेनाओं के मध्य में ले चलने को क्यों कहा? क्या उसे पहले से नहीं मालूम था कि उसे किन से युद्ध करना है? युद्ध के पहले वाली रात में कौरवों के दूत शकुनि-पुत्र उलूक को दुर्योधन के नाम अपना संदेश देते हुए अर्जुन ने स्वयं कहा था: “में तुम्हारे सामने सबसे पहले पितामह भीष्म का ही संहार करूंगा——भीष्म, द्रोण, कर्ण के युद्ध में काम आते ही तुम अपने जीवन, राज्य और पुत्रों की आशा छोड़ दोगे।” फिर एक ही रात में वह यह कैसे भूल गया कि उसे युद्ध किन लोगों से करना था? कुछ विद्वान् इस मत के हैं कि अर्जुन कौरवों की अट्ठारह अक्षौहिणी की विशाल सेना देखकर डर गया था और युद्ध से बचने या भागने का बहाना खोज रहा था। यह मत भी ठीक प्रतीत नहीं होता क्योंकि सेनाओं के मध्य रथ ले जाने के ठीक पहले श्रीकृष्ण की सलाह पर अर्जुन ने भगवती दुर्गा की आराधना कर उन्हें प्रसन्न किया था, और उनसे विजयी होने का आशीर्वाद भी प्राप्त किया था; अर्जुन जानता था कि विजय तो उसी की होने वाली है, फिर डर का क्या मतलब?
एक तर्क तो यह दिया जा सकता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने एक युगांतरकारी उपदेश देने के लिये वातावरण का निर्माण करने हेतु अर्जुन को पहले मोह में डाला और फिर उसका निराकरण किया। गीता ही नहीं, पूरे महाभारत की व्याख्या कुछ महापुरुष इस प्रकार करते हैं कि महाभारत का युद्ध कोई वास्तव में ज़मीन पर ज़मीन के लिये लड़ा गया युद्ध था ही नहीं, और यह मनुष्य के मुक्त होने के लिये चलने वाले आन्तरिक संघर्षों की कहानी है जिसमें विभिन्न पात्र विभिन्न मनोवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन पर विजय प्राप्त करके अन्ततोगत्वा जीव मुक्त होता है। वर्तमान समय में पूज्य स्वामी अड़गड़ानन्द जी इस मत के प्रमुख प्रतिपादक संत हैं जिनकी ‘यथार्थ गीता’ गीता की शांकरभाष्य से बिल्कुल अलग टीका प्रस्तुत करती है जहाँ धर्मक्षेत्र एवं कुरुक्षेत्र और कुछ नहीं मात्र मानव-शरीर ही है जिसके अंदर मुक्ति के लिए संग्राम चलता रहता है; जहाँ भीष्म भ्रम हैं, द्रोण द्वैत हैं, कर्ण विजातीय कर्म है तो दुर्योधन गलत तरीके से अर्जित धन: इन प्रवृत्तियों से संघर्ष करके इन पर विजय प्राप्त करने का नाम ही मुक्त होना है। विद्वानों का एक वर्ग है जो गीता को महाभारत से बिल्कुल अलग और उसके बाद का ग्रंथ मानता है। इस मत के विद्वानों का विचार है कि गीताकार ने बड़ी चालाकी से अपने ग्रंथ को महाभारत में समाहित कर लिया है जिससे उसकी रचना का लोप न हो।
इस मत के अनुसार अगर महाभारत एक कल्पनिक घटना न भी हो, तब भी गीता तो शुद्ध काल्पनिक है। अगर इन मतों को स्वीकार कर लिया जाय, तब तो अर्जुन का युद्ध से पहले रथ को सेनाओं के मध्य ले चलने का अनुरोध मात्र कवि की कल्पना अथवा ज्ञान-प्राप्ति की तीव्र उत्कण्ठा है, परंतु ऋषि अरविन्द इन मतों की चर्चा के बाद इनको अस्वीकार कर देते हैं। उनके अनुसार अर्जुन काल और देश की सीमाओं और तदनुसार धर्म और कर्म की परम्परागत परिभाषाओं में आबद्ध एक कर्मठ मनुष्य है जिसका जीवन संघर्षपूर्ण रहा है और जिसके अब तक के द्वंद्वों में भाइयों, परिवार और समाज के दिशा-निर्देश उसका मार्गदर्शन करते रहे हैं। वह जानता था कि युद्ध अवश्यंभावी है, और वह यह भी जानता था कि उसे युद्ध किनसे करना है, परंतु युद्ध के मैदान में जब वह कौरवों की विशाल सेना के सम्मुख हुआ, तब अचानक उसके ऊपर यह तथ्य प्रकट हुआ कि वह कितने बड़े नरसंहार का कारण बनने जा रहा है! यह एक सामान्य परिस्थिति नहीं थी जिसमें उसकी परम्परागत शिक्षाएं काम आतीं; यह एक ऐसा अवसर था जो किसी योद्धा के जीवनकाल में एक बार उपस्थित होता है; वह अपने पिछले संघर्षों, पिछली प्रतिज्ञाओं और कुछ देर पहले ही मिले भगवती दुर्गा के आशीर्वाद को भी भूल गया, और किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गया। ऐसी मोहग्रस्त अवस्था में उसने भगवान श्रीकृष्ण से दोनों सेनाओं के मध्य ले चलने को कहा। उसी मोहग्रस्त अवस्था में सेनाओं के बीच जाकर जब उसे अपने सगे-सम्बंधी दिखे, तो उसका रहा-सहा विवेक भी जाता रहा, और वह विषादग्रस्त होकर, गाण्डीव छोड़कर ‘न योत्सामि’ कहते हुए रथ के पिछले भाग में बैठ गया। यह तो हुई अर्जुन के विषादग्रस्त होने की कथा, अब मूल प्रश्न पर लौटते हैं: अर्जुनविषादयोग कैसा योग है?
एक बात तो तय है: अगर युद्ध के आरम्भ में अर्जुन को यह विषाद न हुआ होता, अथवा वह अर्जुनविषादयोग में प्रवृत्त न हुआ होता, तो उसे सांख्यादि योगों की शिक्षा न मिली होती। इस विषादयोग का इतना महत्त्व तो स्वीकार करना ही होगा कि यह अन्य योगों में दीक्षा के द्वार खोलता है, पर सवाल उठता है: अर्जुनविषादयोग है क्या? क्या दोनों पक्षों को युद्ध के लिए उकसा कर मैदान छोड़कर भाग खड़े होना अर्जुनविषादयोग है? अगर ऐसा होता, तो हर गली में ‘युद्ध नहीं शान्ति चाहिए’ का बैनर उठाये घूमने वाले अर्जुनविषादयोगी  कहलाते। आज पूरा विश्व एक बड़े युद्ध के मुहाने पर खड़ा है, और युद्ध अवश्यम्भावी दीखता है, पर यह आधुनिक विषादयोगी शान्ति का झण्डा उठाये उसी पक्ष को शान्त करने में जुटे रहते हैं जो पहले से ही शान्त है, और इस प्रकार आक्रामक पक्ष को और आक्रामक होने के अवसर देते हैं। उदाहरण के लिए कश्मीर के संदर्भ में इन योगियों का आचरण सर्वविदित है। पत्थरबाजों और भारतीय सुरक्षाबलों के ठिकानों पर हमलों पर यह पूर्ण तटस्थ रहते हैं, और भारत सरकार पर इस बात के लिए दबाव डालते हैं कि वह पत्थरबाजों के साथ नरमी और सहानुभूति के साथ पेश आये। अगर अर्जुन इसी प्रकार के विषाद का शिकार हुआ होता, तो महाभारत का युद्ध शायद टल जाता, और फिर शुरू होती कौरवों के षड्यंत्रों की नयी श्रृंखला! स्पष्टतः यह अर्जुनविषादयोग नहीं है।
अर्जुनविषादयोग को समझने के लिये हमें पहले अर्जुन के चरित्र को समझना होगा क्योंकि अन्य योगों के द्वार खोलने वाला अर्जुनविषादयोग अर्जुन जैसे चरित्र पर ही अवतरित हो सकता है। युद्ध के मैदान में सभी थे, पर सगे-सम्बन्धियों की हत्या में भागीदार बनने की संभावना से विषाद केवल अर्जुन को ही हुआ, इसके कारणों की भी पड़ताल ज़रूरी है। अर्जुन एक सीधा-सादाऔर संवेदनशील प्राणी था: अर्जुन का अर्थ ही होता है-सरल, शुद्ध, सात्त्विक; उसे युद्ध और अनावश्यक मार-काट में अंतर मालूम था। युद्ध से अर्जुन को कोई परहेज नहीं है क्योंकि युद्ध उसका स्व-भाव है, और युद्ध के लिये वह प्रशिक्षित है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता-प्रवचन के अंत में उसे बताया भी कि युद्ध करना उसका स्वभाव है और युद्ध से वह भाग नहीं सकता (यद्यहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यते, मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वाम्नियोक्ष्यति। 18/59 तथा स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा, कर्तुम् नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोsपितत्। 18/60), पर अर्जुन मोहित हुआ अपने सगे-सम्बन्धियों को देखकर।वस्तुतः महाभारत के युद्ध में अर्जुन ने स्वयं को ऐसी परिस्थिति में पाया जिसमें उससे पहले किसी ने नहीं पाया था। उसके अतिरिक्त वह अर्जुन था-सीधा, सरल, सात्त्विक, कर्मयोगी: यदि वह यह सब न होता तो उसे भगवान श्रीकृष्ण का साख्य न मिला होता। इन दोनों उपादान कारणों ने मिलकर उसके मस्तिष्क की अवस्था ऐसी बना दी कि वह अहंकार, नीतियाँ, सिद्धान्त, पूर्वाग्रह आदि सबसे रहित हो गया। वह एक ऐसी तरल अवस्था में पहुँच गया जहाँ ज्ञान की तड़प के साथ स्वीकार करने की भी क्षमता जुड़ जाती है, पर बुद्धि को किनारे रखकर नहीं, बाकायदा तर्कों के साथ। यह वह अवस्था है जहाँ मनुष्य ज्ञान न केवल प्राप्त करने के लिए बल्कि उसे आत्मसात् करने के लिए भी तैयार हो जाता है। लेखक के विचार से यही अर्जुनविषादयोग है।
जिस प्रकार कठोपनिषद का नचिकेता यमराज से आत्मा के विषय में प्रश्न पूछने से पहले जानता था कि आत्मा ही अजर-अमर-अविनाशी तत्त्व है-अगर ऐसा न होता तो वह यमराज द्वारा दिए गये दीर्घायु, अपरिमित धन और अप्सराओं के प्रलोभनों को यूँ ही ठुकरा न देता, पर यमराज जैसा वक्ता सामने पाकर उसने उनसे आत्मा-विषयक गुह्य ज्ञान प्रकट करवा लेना उचित समझा, उसी प्रकार अर्जुन भी कदाचित यह जानता था कि युद्ध तो उसे करना ही है, पर महाभारत जैसा अवसर और श्रीकृष्ण जैसा गुरु समक्ष देखकर उसने भी अपनी ज्ञान-पिपासा को शांत कर लेना ही उचित समझा।
लेख समाप्त करने से पहले एक प्रसंग और। युद्ध और युधिष्ठिर के राज्याभिषेक तथा राजसूयादि यज्ञों के उपरांत एक दिन ऐसे ही अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से युद्ध से पहले दिया गया गीता का उपदेश दुहराने की प्रार्थना की, तो भगवान ने उसे झिड़क दिया क्योंकि उस समय अर्जुन का प्रश्न ज्ञान प्राप्त करने की उत्कण्ठा से प्रेरित न होकर केवल बुद्धि-विलास से प्रेरित था। मस्तिष्क को ज्ञान को ग्रहण करने योग्य तरल बना लेना ही अर्जुनविषादयोग है, और यह काम एक दिन में नहीं होता। योगी को इसके लिए पहले अर्जुन सा सरल, सात्त्विक और तपस्वी होना पड़ता है, तब जाकर भगवान श्रीकृष्ण जैसा गुरु प्राप्त होता है, और महाभारत के युद्ध सा अवसर उपस्थित होता है।
कृष्णम् वन्दे जगद्गुरुम्।

Friday, March 24, 2017

मोदी को हरा पाएगा महागठबंधन?

प्रातःस्मरणीय कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर, नेशनल कान्फरेन्स के युवा नेता उमर अब्दुल्ला और सेकुलरता के स्वघोषित चैंपियन जदयू नेता केसी त्यागी का विचार है कि सभी गैर-भाजपा दलों का एक महागठबंधन बनना अत्यंत आवश्यक है जिससे 2019 के लोकसभा-चुनाव में भाजपा को कड़ी टक्कर दी जा सके।
इस क्रांतिकारी विमर्श में यह स्वीकारोक्ति तो छिपी ही है कि मोदी के नेत्तृत्व में भाजपा अब इतनी शक्तिशाली हो चुकी है कि उससे अकेले निपटना अब किसी के लिए कल्पना से परे हो गया है, और यह भी स्पष्ट हो गया है कि हमारे यह विपक्षी नेता अंकगणित के बहुत अच्छे जानकार हैं: अंकगणित की इस गहरी समझ के कारण ही वह यह पता लगाने में सफल हुए हैं कि देश का बहुमत भाजपा के खिलाफ़ है, और इस बहुमत को एक साथ अपने पक्ष में लाकर वह मोदी को हरा सकते हैं।
ज्ञातव्य है कि गत लोकसभा-चुनाव तथा हाल ही में सम्पन्न हुए उत्तर प्रदेश के विधानसभा-चुनाव में भाजपा को क्रमशः लगभभग 31% और 40% मत मिले थे, जिसके आधार पर हमारे विपक्षी नेता और उनके साथी बुद्धिजीवी यह निष्कर्ष निकाल रहे हैं कि अभी कम से कम दो तिहाई जनमत मोदी के खिलाफ़ है, जिसे अपेक्षाकृत आसानी से एक मोदी-विरोधी छतरी के नीचे लाया जा सकता है, और इस तरह मोदी को सत्ता से बेदखल किया जा सकता है। विपक्ष और बुद्धिजीवियों के इस निष्कर्ष के पीछे सिर्फ़ उनका अंकगणित का ही नहीं उनका सामाजिक विज्ञान का ज्ञान भी है जो उन्हें बताता है कि इस दो तिहाई वर्ग का लगभग सारा भाग दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग से मिल कर बना है, जिनके वोटों के वह नैसर्गिक अधिकारी हैं, और मोदी जिस पर दावा नहीं कर सकते।
विपक्ष की ओर से और उनकी तरह सोचा जाय तो आज उनके पास महागठबंधन के अलावा कोई चारा भी नहीं है. वह मोदी के सम्प्रदायिक चरित्र का भोंपू अलग-अलग बजा कर देख चुके, अब उसी को एकसाथ मिलकर बजाने के अतिरिक्त वह कुछ सोच भी नहीं सकते, पर क्या इस सामूहिक वादन से कोई सुरीला राग निकलेगा? दलित-पिछडे और अल्पसंख्यक वोटों के ध्रुवीकरण का प्रयास राममनोहर लोहिया के समय से चल रहा है: बदलाव केवल यह हुआ है कि पहले यह प्रयास नेहरूजी की अभिजात्य कुलीनता के विरुद्ध हो रहे थे, और अब मोदी की तथाकथित साम्प्रदायिक नीतियों के विरुद्ध हो रहे हैं. पहले यह सफल नहीं हुए; हमारे बुद्धिजीवी मित्र अब इनके सफल होने को लेकर बहुत उत्साहित हैं. इस उत्साह के पीछे उनका यह विश्वास है कि पण्डित नेहरू तो दलित-पिछडे-अल्पसंख्यक वर्ग में भी काफी लोकप्रिय थे, पर साम्प्रदायिकता एक ऐसा मुद्दा है जिसे यह वर्ग कभी स्वीकार नहीं करेगा, इसलिये अगर साम्प्रदायिकता का मुद्दा इस वर्ग में ठीक से उछाल दिया जाय, तो मोदी की पराजय निश्चित है.
सबसे पहले तो हमारे नेताओं का यह निष्कर्ष ही संदेहास्पद है कि क्योंकि मोदी को किसी चुनाव में अभी तक 50% वोट नहीं मिले हैं, इससे सिद्ध होता है कि बहुमत उनके खिलाफ है। ठीक है कि मोदी को लोकसभा-चुनाव में 31% वोट मिले थे, पर इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी 69% लोग मोदी से उसी तरह घृणा करते हैं जिस तरह हमारे विपक्षी नेता एवं बुद्धिजीवी। इन वोटरों के पास कई विकल्प थे, और मोदी उनकी पहली पसन्द नहीं थे। अगर उन्हें दो ही विकल्प दिए जाते, तब भी उनका मत मोदी के ख़िलाफ़ ही जाता- यह मान लेना एक गलती है।  इस तरह महागठबंधन बनाने के सुविचार के पीछे का मूलभूत तर्क ही दोषपूर्ण सिद्ध हो जाता है, और परिणामतः उसके फलीभूत होने की सम्भाव्यता पर भी प्रश्नचिह्न खड़े हो जाते हैं। अब महागठबंधन के वास्तव में बन जाने की सम्भावनाओं पर विचार करते हैं।
इतिहास बताता है कि गठबन्धन मजबूत दलों और नेताओं के इर्द-गिर्द ही बनते हैं, और और उनका टिकाऊपन केंद्रीय दल या नेता की मजबूती से सीधे-सीधे समानुपातिक होता है। 1996 में जब चुनाव में 150 सीटें जीतने के बाद अटलजी ने एक गठबंधन बनाने की कोशिश की, तो वह सफल नहीं हुए। 1998 में जब उनहोंने भाजपा की 167 सीटों की बढ़ी हुई ताकत के साथ गठबंधन बनाने की कोशिश की, तो वह इसमें तो सफल रहे, पर उनका गठबंधन टिकाऊ नहीं हो सका; साल भर के बाद उनकी सरकार गिर गयी। 1999 में जब भाजपा 182 सीटें जीत कर आयी, तब गठबंधन भी बना, और वह पाँच सालों तक टिका भी: कभी एक दल ने अपना समर्थन वापस लिया भी, तो समर्थन देने के लिए दूसरा दल तैयार खड़ा था। बाद में 2004 में राजग की हार के बाद जब भाजपा का संख्याबल कम हो गया, तब उनका गठबंधन भी स्वतः बिखर गया। बीच में देवेगौड़ा जी के नेतृत्व में भी एक गठबंधन बना, पर उसकी चारो ओर से  टाँगें खींची जाती रहीं, और एक दिन वह अपनी मौत मर गया। उसके बाद गुजराल के नेतृत्त्व में गठबंधन बना जो गठबंधन के ही सबसे बड़े घटक द्वारा ही तोड़ दिया गया। वर्तमान समय में भी केंद्र तथा उत्तर प्रदेश में गठबंधन-सरकारें ही काम कर रही हैं, पर गठबंधनों के केंद्र में क्रमशः मोदी और योगी के नेत्तृत्व में पर्याप्त संख्या-बल के साथ भाजपा मौजूद है अतः इनके बिखरने की कोई सम्भावना नहीं है। इतनी सूचना यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि एक सफल गठबंधन के लिए गठबंधन के मूल में एक मजबूत दल और मजबूत नेता का होना अनिवार्य है। क्या विपक्ष के पास ऐसा दल या ऐसा नेता है?
इस प्रश्न पर अंतहीन चर्चा चल सकती है, पर इससे बचते हुए यह कहना ही पर्याप्त होगा कि न तो विपक्ष में इतना मजबूत कोई दल है जो अन्य दलों को आकर्षित कर सके, और न ही कोई सर्वमान्य नेता जिसके व्यक्तित्व के चुम्बक से सभी नेता और दल खिंचे चले आयें जिससे महागठबंधन आकार ले सके। सिर्फ़ बहस के लिये  अगर हम यह मान भी लें कि 2019 के चुनाव में अभी काफी समय है, और हमारे विपक्षी नेता इस बीच  अपने मतभेद दूर कर लेंगे, और एक महागठबंधन बना लेंगे, तब भी एक मजबूत दल और नेता के अभाव में यह गठबंधन ढीला-ढाला ही रहेगा। इसके अतिरिक्त यह भी संदेहास्पद है कि केवल एक व्यक्ति के प्रति तीव्र घृणा समय की धारा को मोड़ देने वाले एक महागठबंधन का आधार बन सकती है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि महागठबंधन बनने की राह में अनेक अड़चनें हैं। अब इसकी विवेचना करते हैं कि तमाम अड़चनों के बावजूद अगर 2019 के आम चुनाव तक महागठबंधन बन ही जाता है, तो इसकी सफलता की कितनी सम्भावनाएं रहेंगी।
पहली बात तो यह है कि विपक्ष और उनके समर्थक बुद्धिजीवियों ने खुद महागठबंधन की सफलता के सम्बन्ध में जो हिसाब लगा रखे हैं, वह एक ऐसी कल्पना पर आधारित हैं जिसे अर्थशास्त्र की भाषा में सेटेरिस परीबस (CETERIS PARIBUS: Other things remaining the same) कल्पना कहते हैं। वह यह मान कर चल रहे हैं कि जब तक वह महागठबंधन बनाने लिए जोड़-तोड़ करेंगे, तब तक मोदी चुप-चाप बैठे रहेंगे और महागठबंधन को आकार लेते देखते रहेंगे। यह कल्पना कितनी वास्तविक है? यह भी देखना होगा कि जिस दलित-पिछड़े-अल्पसंख्यक गठजोड़ के बल पर महागठबंधन बनाने की तैयारियाँ चल रही हैं, वह उसी तरह इनकी जेब में है जैसे यह कह रहे हैं? उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजों के विश्लेषण करने वाले अनेक धुरन्धर विद्वान अनिच्छापूर्वक ही सही, पर यह मानने पर विवश हुए कि मोदी ने इस दलित-पिछड़े-अल्पसंख्यक वर्ग के वोटों में भी सेंध लगा दी है। आने वाले समय में हम देखेंगे कि केंद्र सरकार की नीतियाँ और योगी आदित्यनाथ जैसे मुख्यमंत्रियों के हाथों उनका क्रियान्वयन इसी दिशा में बढ़ेंगे जिससे इस वर्ग के लोग और तेज़ी से मोदी के समर्थन में आयेंगे। ऐसे में केवल मोदी के खिलाफ नकारात्मक प्रचार और साम्प्रदायिकता का हौवा खड़ा करके विपक्ष इस वर्ग का समर्थन हासिल कर लेगा, इसकी सम्भावनाएं अत्यंत न्यून हैं। जैसे-जैसे महागठबंधन के प्रयास तेज़ होंगे, मोदी के दलित-पिछड़े-अल्पसंख्यक वर्ग के बीच पैठ बढ़ाने वाले कार्यक्रमों के क्रियान्वयन भी तेज़ होंगे, और इस दौड़ में विपक्ष मोदी को मात दे सकेगा-यह अभी तो एक दिवास्वप्न जैसा ही लगता है। फिर यह गठबंधन मोदी को हराने के लिए बन रहा है-जीतने के लिए नहीं; दूसरी ओर मोदी जीत के लिए खेल रहे होंगे। दोनों पक्षो के दृष्टिकोण का यह अंतर भी विपक्ष की सम्भावनाओं को दक्षिण दिशा की ओर ले जायेगा, और मोदी उसी तरह विजयी होंगे, जैसे अब तक होते रहे हैं।
जो भी हो, विपक्ष की महागठबंधन बनाने की यह योजना है बड़ी रूमानी। विपक्ष को महागठबंधन अवश्य बनाना चाहिए; और तो सबकुछ वह कर ही चुके हैं।
हमारी शुभकामनाएं विपक्षी नेताओं और उनके समर्थक बुद्धिजीवियों के साथ रहेंगी।

Monday, February 27, 2017

भक्त होने के फायदे

देश के खुर्राट बुद्धिजीवी जिनमें मुख्यतया प्रिंट और एलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मुख्यधारा के पत्रकार, वामपंथी विचारक व लेखक तथा गोष्ठियों और समाचर-चैनलों में अपने मत के समर्थन में गले और फेफडे की पूरी ताक़त लगाकर चिल्लाने और इस तरह दूसरों को चुप कर देने वाले वाचक सम्मिलित हैं, मोदी के समर्थकों के लिये एक बड़े अच्छे शब्द का प्रयोग कर रहे हैं: मोदी-भक्त!
मोदी, जैसा कि सभी को पता है, एक मनुष्य हैं जो इन बुद्धिजीवियों के समर्थन के बिना न केवल भारत के प्रधानमंत्री-पद पर जा विराजे हैं, बल्कि उस पर इनके विरोध के बावजूद पिछले ढाई सालों से लगातार विराज रहे हैं. हमारे बुद्धिजीवी मित्र मोदी को पसंद नहीं करते-कुछ लोग तो उनका नाम तक लेने में अपमान का अनुभव करते हैं, और दिन-रात मोदी को शाप दिया करते हैं. अगर इन बुद्धिजीवियों में एक-दो भी उच्च कोटि के ऋषि रहे होते, तो मोदी कब के जल कर भस्म हो गये होते, पर इन बुद्धिजीवी मित्रों से ऋषितुल्य होने की उम्मीद करना भी मूर्खता है क्योंकि न तो यह प्राचीन भारत में ऋषियों की उपस्थिति की कल्पनाओं में विश्वास रखते हैं, और न ही ऋषियों के समान बनने की इनकी कोई इच्छा है. अपनी-अपनी बुद्धियों के स्वनिर्मित सुरम्य वातावरण से निकल कर मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार के परे जाकर ब्रह्मचर्यादि साधनों की सहायता से सत्य नाम की चिड़िया के पीछे भागते रहने की कल्पना कितनी नीरस है! बुद्धिजीवी ऐसी फालतू बातों में समय नष्ट नहीं करते. मुद्दे की बात यह है कि हमारे बुद्धिजीवी मित्र समझते हैं कि केवल बुद्धिबल से वह मोदी को पलक झपकते ही न केवल सत्ता से बेदखल कर देंगे, बल्कि उन्हें परिदृश्य से ही गायब कर देंगे जिससे भविष्य में भी वह कभी प्रधानमंत्री न बन सकें. स्पष्टतया यह लोग अपने उद्देश्य में बहुत सफल नहीं हो रहे हैं, और इसके लिये मोदी के समर्थकों को जिम्मेदार ठहराते हैं. इसीलिये मोदी के समर्थकों के लिये इन्हें 'मोदी-भक्त' जैसा शब्द गढ़ना पड़ा.
'भक्त' शब्द पर हम थोड़ा विस्तार से चर्चा करेंगे. अभी तो यही कहना पर्याप्त होगा कि देश का अधिसंख्यक समाज 'भक्त' शब्द को बहुत सम्माननीय मानता है: उसके बहुत से पूज्य महापुरुषों के नाम के साथ यह शब्द प्रयुक्त होता रहा है, जैसे भक्त ध्रुव, भक्त प्रह्लाद, भक्त सूरदास, भक्त नरसी मेहता इत्यादि, पर हमारे बुद्धिजीवी मित्रों के शब्दकोश से यह शब्द कम से कम इस अर्थ में गायब है. बुद्धि के व्यापार में भला भक्ति का क्या काम? बुद्धिजीवी-शब्दकोश में 'भक्त' का अर्थ है- मूर्ख, बुद्धि के उपयोग में सर्वथा असमर्थ, दुराग्रही. देखने में आ रहा है कि मोदी के प्रशंसकों पर हमारे बुद्धिजीवियों के तमाम तर्कों का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है, और उनकी कड़ी मेहनत के बावजूद निजी तौर पर मोदी की स्वीकार्यता और विश्वसनीयता में तनिक भी कमी नहीं आयी है, हमारे बुद्धिजीवी मित्रों ने अपने तर्कों के खोखले, छल-युक्त अथवा झूठे होने की संभावनाओं को सिरे से खारिज करते हुए मोदी के समर्थकों पर ही इसका सारा ठीकरा फोड़ दिया, और उनके लिये 'भक्त' शब्द का प्रयोग शुरु कर दिया. तो मोदी के समर्थक हो गये मोदी के भक्त, जो सम्बंध तत्पुरुष समास के नियम से हो गये मोदी-भक्त! कुछ अति विशिष्ट श्रेणी के बुद्धिजीवी जो मोदी का नाम लेने में भी अपमान का अनुभव करते हैं, वह केवल 'भक्त' शब्द से ही अपना काम चला लेते हैं.
भक्ति की महिमा से हमारे धर्मशास्त्र भरे पड़े हैं. नारदभक्तिसूत्र के पहले तीन सूत्रों में भक्ति के बारे में कहा गया है: भक्ति प्रेम की पराकाष्ठा है (सा त्वस्मिन् परमप्रेमस्वरूपा), जो अमरत्व की ओर ले जाती है (अमृतस्वरूपा च) तथा जिसे पाकर आत्मा तृप्त हो जाती है, सिद्ध हो जाती है (यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, सिद्धो भवति). प्रेम, जो भोजनादि की तरह जीवन की एक आवश्यक आवश्यकता है, जिसके बिना जीवन अस्तित्व में तो बना रह सकता है, पर सार्थक नहीं हो सकता, भक्ति उसकी पराकाष्ठा है. प्रेम-रस में आकण्ठ आकण्ठ डूबा रसिक जब भक्त बन जाता है, तब वह सम्पूर्ण हो जाता है: उसकी कोई इच्छा नहीं होती, वह ईर्ष्या-द्वेष के परे निकल जाता है (यत्प्राप्प्य न किंचित् वांछति, न शोचति, न रमते, नोत्साही भवति-नारद भक्ति सूत्र). भक्ति की ऐसी महिमा देवर्षि नारद ने बतायी है.
श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने अनेक स्थानों पर भक्ति की महिमा का बखान किया है. अरण्यकाण्ड में शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश देने से पहले रामचंद्रजी भक्ति का महात्म्य बताते हुए कहते हैं: भगति हीन नर सोहइ कैसा, बिनु जल बारिद देखिय जैसा. भक्ति के बिना मनुष्य उसी तरह बेकार है जिस तरह बिना पानी के बादल. उत्तर काण्ड में काकभुशुण्डि-गरुड़ संवाद में भक्ति का विस्तृत निरूपण हुआ है:
जे अस भगति जानि परिहरहीं, केवल ज्ञान हेतु श्रम करहीं. ते जड़ कामधेनु गृह त्यागीं, खोजत आकु फिरहिं पय लागीँ. सुनु खगेस हरि भगति बिहाई, जे सुख चाहहिं आन उपाई. ते सठ महासिन्धु बिनु तरनी, पैरि पार चाहहिं जड़ करनी. सुनि भुसुण्डि के बचन भवानी, बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी. तव प्रसाद प्रभु मम उर माँहीं, संसय सोक मोह भ्रम नाहीं.
जो मनुष्य भक्ति की महिमा जानकर भी उसे छोड़ ज्ञान के पीछे भागते रहते हैं, वह घर पर खड़ी कामधेनु को त्याग कर दूध के लिये आक (मदार) के पेड़ को ढूंढने जैसा काम करते हैं. जो भक्ति से इतर अन्य उपायों से सुख की कामना करते हैं, वह मूर्ख और अभागे हैं जो बिना जहाज के तैर कर समुद्र पार करना चाहते हैं. भक्ति की ऐसी महिमा जान कर पक्षिराज गरुड़ बोले- है प्रभु! अब आपके प्रसाद से मेरे हृदय में संशय, शोक, मोह, भ्रम-कुछ भी नहीं रह गया है.
भक्ति को ज्ञान के आगे की अवस्था बताते हुए कागभुशुण्डि जी कहते हैं: वैराग्य रूपी तलवार से अपनी रक्षा करते हुए ज्ञान की तलवार से मद, लोभ, मोह आदि शत्रुओं को मारकर अंत में जो विजय मिलती है, वही भक्ति है: बिरति चर्म असि ज्ञान मद लोभ मोह रिपु मारि, जय पाइय सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि.
गीता में भक्त और भक्ति की महिमा का वर्णन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् मैत्रः करुण एव च, निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखःक्षमी. संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः, मय्यर्पित मनोबुद्धिर्योमद्भक्तः स मे प्रियः. (12/13, 14) जो किसी से द्वेष नहीं रखता, जो सभी प्राणियों से मैत्री और करुणा का भाव रखता है, किसी से ममत्व नहीं रखता (अर्थात् पक्षपात से रहित है), अहंकार से जो दूर है, दुःख और सुख के आवेगों को जो समभाव से झेल जाता है, जो क्षमाशील है, जो सतत संतुष्ट है, योगी है, जो अपने मन और बुद्धि को मुझे अर्पित कर (कर्मफल की चिंता से सर्वथा निर्लिप्त) अपने निर्दिष्ट कर्म में लगा हुआ है, ऐसा भक्त मुझे प्रिय है. यह भक्ति से मिलने वाले लाभ हैं: ईर्ष्या-द्वेषादि का नाश, सभी प्राणियों में समत्व, मैत्री एवं करुणा का भाव, क्षमा, संतोष आदि गुण भक्ति से प्राप्त होते हैं- ऐसा भगवान श्रीकृष्ण का वचन है, और इन गुणों का निरूपण मोदी के समर्थकों में हमारे बुद्धिजीवी मित्र कर रहे हैं. मोदी- भक्तों को इन बुद्धिजीवियों का विरोध भला क्यों करना चाहिये? और भक्त तो विरोध करते भी नहीं; वह तो इनके वचनों को उसी प्रकार झेल जाते हैं जिस प्रकार पर्वत वर्षा की बूँदों को झेल जाते हैं: बूँद अघात सहहिं गिरि कैसे, खल के बचन संत सहँ जैसे- (रामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड).
यह गुण देश के बहुसंख्यक समाज के लिये ग्राह्य होंगे, पर हमारे बुद्धिजीवी मित्र इन गुणों से विशेष प्रभावित होंगे-ऐसा मानने का कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं दीखता. वह तो मोदी-समर्थकों के केवल एक गुण से ही प्रभावित होकर उन्हें भक्त बता रहे हैं, और वह गुण है: उनका आराध्य के समक्ष पूर्ण समर्पण और उस पर अगाध विश्वास, जिसे बुद्धिजीवी अपने तमाम प्रयासों से तोड़ नहीं पा रहे हैं, और इसमें आश्चर्य की क्या बात है? गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया ही है: "मय्यर्पितमनोबुद्धिः"! अब हाल के मोदी-सरकार के विमुद्रीकरण के फैसले को ही लें: बुद्धिजीवी बताते रहे कि यह फ़ैसला बिल्कुल गलत और राष्‍ट्रीय हितों के बिल्कुल खिलाफ है, पर किसी मोदी-समर्थक ने इस पर विश्वास नहीं किया. बुद्धिजीवियों ने बैंकों की लाइनों में लगी जनता को भड़काने की कितनी कोशिशें कीं, पर जनता सड़क पर उतरने के बजाय धैर्यपूर्वक लाइनों में खड़ी रही. कारण बिल्कुल स्पष्ट है: विश्वास- ऐसा विश्वास जो बुद्धिजीवियों के तमाम प्रयासों के बीच चट्टान की तरह अडिग रहा, और जिससे मोदी-समर्थकों के मोदी-भक्त बन जाने के बुद्धिजीवियों के आरोप की पुष्टि होती है.
प्रश्न है कि जब भक्त होने के इतने लाभ हैं, तो हमारे बुद्धिजीवी मित्र भी बुद्धि को छोड़कर भक्ति का आश्रय क्यों नहीं लेते? अगर ऐसा हो जाय, तो दुनिया में कितनी शान्ति छा जायेगी! बुद्धिजीवियों को अवश्य इस सुझाव पर विचार करना चाहिये.

Monday, May 28, 2012

नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री कैसे बन सकते हैं?

नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के एक सशक्त दावेदार हैं। अन्य उम्मीदवारों के विपरीत उनकी दावेदारी प्रदर्शन पर आधारित है। वह पिछले 11 सालों से गुजरात के मुख्यमंत्री हैं, और इस पद पर रहते हुए उन्होंने कुशलतापूर्वक अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन किया है. अपने पेशेवर रवैये से अधिकांश पेशेवरों की प्रशंसा अर्जित की है। इतने सालों तक एक पद पर कुशलतापूर्वक कार्य करने के बाद स्वाभाविक है की वह अपने प्रमोशन के बारे में सोचें. उनकी फर्म (India Inc) के मालिक होने के नाते हमें भी सोचना चाहिए कि उनके कौशल का और अधिक लाभ उठाने के लिए उनका प्रमोशन कर देना चाहिए।
पर जैसा हमारे सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों में होता है, और शायद निजी क्षेत्र में  भी होता हो, केवल योग्यता रखने से प्रमोशन नहीं हो जाता।  और प्रधानमंत्री के पद पर प्रमोशन यूं भी कोई मामूली प्रमोशन नहीं है। यह प्रमोशन लेने के लिए मोदी को  नाकों चने चबाने पड़ेंगे।
सबसे पहले हम यह देखें कि मोदी के रास्ते की दिक्कतें क्या हैं।
1, उनकी पार्टी (भाजपा) की विश्वसनीयता शून्य पर पहुँच चुकी है, और वह निकट भविष्य में देश में इतनी सीटें जीतने की उम्मीद नहीं कर सकती कि अपने उम्मीदवार को प्रधानमंत्री बनवा दे। इस प्रकार से देखा जाय तो भाजपा मोदी के ऊपर एक बोझ है, जिसे उतारे बिना वह इस रास्ते पर एक कदम भी नहीं चल सकते। यह भी कहा जा सकता है की मोदी भाजपा पर एक बोझ हैं, जिसके रहते हुए भाजपा को पर्याप्त संख्या में सहयोगी नहीं मिल सकते. बात बिलकुल ठीक है, पर एक तो भाजपा को सहयोगी मिलने की संभावनाएं खुद भाजपा के पर्याप्त संख्या में सीटें जीतने के ऊपर निर्भर करती हैं, और दूसरे भाजपा के सहयोगी भाजपा के साथ सहयोग किसी मजबूरी में करते हैं। बंगाल, ओडिशा, आंध्र और बिहार के प्रयोगों से यह स्पष्ट है कि भाजपा के सहयोगी भाजपा की दुकान बंद करने के लिए उतने ही उत्सुक रहते हैं, जितने कि भाजपा के शत्रु। इसलिए भाजपा मात्र 75 सीटें जीतकर अगर केवल सहयोगियों के बल  पर (मोदी से इतर किसी और के नेतृत्व में) सत्ता में आने की सोचती है, तो यह एक दिवास्वप्न ही कहा जाएगा। सत्ता में आने के लिए उसे कम से कम 180 सीटें जीतनी ही होंगी। सहयोगी उसके बाद ही मदद कर पायेंगे। भाजपा न तो मोदी के बिना 180 सीटें जीत सकती है, न उनके साथ। इसलिए यही कहना यथेष्ट होगा कि भाजपा मोदी के ऊपर एक बोझ है
2. भाजपा के अन्दर ही मोदी के शत्रुओं की संख्या अच्छी-खासी है, और यह संख्या दिनोदिन बढ़ती ही जा रही है। इसके कारण मोदी के लिए पार्टी के अन्दर ही प्रधानमंत्री पद का नामांकन प्राप्त करना अत्यंत कठिन कार्य होगा।   
इस चर्चा से यह स्पष्ट है कि मोदी अगर प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, तो उन्हें भाजपा से पीछा छुड़ाना ही होगा।
अब यह देखा जाय कि इन कठिनाइयों के बाद भी मोदी कैसे प्रधानमंत्री बन सकते हैं।
भारत के अब तक के प्रधानमंत्रियों को चार श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है:
1.  नेहरू  परिवार के सदस्य
2. नेहरू परिवार के किसी सदस्य के पद-ग्रहण हेतु तैयार हो जाने तक नेहरू परिवार द्वारा समर्थित तदर्थ (स्टॉप गैप) व्यक्ति। इस श्रेणी में आने वाले प्रधानमंत्री रहे हैं: गुलजारीलाल नंदा, लालबहादुर शास्त्री, नरसिंहराव तथा चंद्रशेखर।
3. पूर्णतया अनजान व्यक्ति, जिनकी विशेषता यह थी कि उनका कोई शत्रु नहीं था। जैसे देवे गौड़ा और गुजराल।
4. विश्वनाथ प्रताप सिंह। इनकी अलग श्रेणी है।  देश के छोटे से इतिहास में यह एकमात्र ऐसे व्यक्ति हुए हैं, जिन्होंने एक स्थापित (established) राजनैतिक दल से विद्रोह किया, एक मुद्दे को लेकर जन-आन्दोलन छेड़ दिया, और उस मुद्दे पर विजयी होकर देश के प्रधानमंत्री पद पर जा पहुंचे। विश्वनाथ प्रताप सिंह को आप भले ही पसंद न करते हों, पर उनकी इस उपलब्धि पर उनकी दाद तो देनी ही होगी।
अब नरेंद्र मोदी पहली, दूसरी और तीसरी श्रेणियों में तो फिट हो नहीं सकते। उन्हें अगर प्रधानमंत्री बनना है, तो उन्हें विश्वनाथ प्रताप सिंह वाला रास्ता ही पकड़ना होगा।
क्या मोदी ऐसा कर सकते हैं? क्या कोई ऐसा मुद्दा है, जिस पर मोदी को उसी प्रकार का जन-समर्थन मिलने की संभावना है, जैसा विश्वनाथ प्रताप सिंह को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मिला था? भाजपा से विद्रोह का सही समय क्या होगा? आगे इन  प्रश्नों के उत्तर खोजने का हम प्रयास करेंगे। 
विश्वनाथ प्रताप सिंह एक मात्र उदाहरण हैं, जिनका अनुकरण मोदी को हर कदम पर करना होगा। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने अभियान के दौरान एक बार भी नहीं कहा कि वह प्रधानमंत्री बनना चाहेंगे। वह तो गाहे-बगाहे यही कहते थे की प्रधानमंत्री के रूप में वह एक असफल व्यक्ति (disaster) साबित होंगे। मोदी को भी यही कहना और कहते रहना होगा, कि वह प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते। एक काम जो मोदी बेहतर ढंग से करते रहे हैं, वह है मुंह बंद रखते हुए काम करना। अपने इसी गुण के बल पर ही वह अपने विरुद्ध अनेक दिशाओं से एक दशक से भी अधिक समय से लगातार चलाये जा रहे चरित्र हनन अभियान को मात देने में सफल रहे हैं। आगे भी उन्हें यही करना होगा।
सबसे पहली लड़ाई तो दिसंबर 2012 में होने वाला गुजरात विधानसभा का  चुनाव है,जो मोदी को  पूरी तरह जीतना होगा। अगर लड़ाई केवल कांग्रेस और मीडिया से होती, तो मोदी को कोई दिक्कत नहीं होती, पर यह लड़ाई केशुभाई पटेल, सुरेशभाई मेहता, संजय जोशी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी है, जिससे मामला थोड़ा  नज़दीकी होता दिख रहा है। मोदी को यह लड़ाई जीतने के लिए अपने पुराने अंदाज़ में काम करते रहना होगा: बोलने का काम केवल विरोधियों  पर छोड़ कर। यह लड़ाई जीतकर मोदी भाजपा में अपनी सर्वोच्चता अंतिम रूप से स्थापित कर देंगे।
इसके बाद की लड़ाई लड़ने के लिए मोदी को 'तेन त्यक्तेन भुंजीथा' की तर्ज़ पर मुख्यमंत्री पद का त्याग करना होगा। मोदी वैराग्य और थकावट वगैरह की बात करते हुए पद-त्याग कर सकते हैं। अच्छा तो यह रहेगा कि कुर्सी पर कोई विश्वसनीय व्यक्ति बैठा कर पदत्याग किया जाय, पर विश्वसनीय व्यक्ति आजकल मिलते कहाँ हैं? यह मान कर ही चलना होगा कि मुख्यमंत्री की कुर्सी एकबार गयी तो गयी। यह कोई बहुत बड़ा नुकसान नहीं होगा। मोदी 11 साल मुख्यमंत्री रह लिए, अब क्या कुर्सी साथ ले जायेंगे?
तो मोदी पार्टी को मज़बूत करने के लिए स्वेच्छा से मुख्यमंत्री का पद छोड़कर संगठन में कार्य करने के लिए दिल्ली पहुँच जायेंगे। यहाँ तक तो कोई दिक्कत नहीं है। 
अब मोदी को सही समय पर सही मुद्दे को पकड़ कर एक देशव्यापी आन्दोलन छेड़ना होगा, और यह करने से पहले भाजपा को भी छोड़ देना होगा। मुद्दा ऐसा होना चाहिए, जिसकी पहुँच हर वर्ग में हो। इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखना होगा कि उनकी हिंदूवादी छवि को कहीं से भी कोई नुकसान न हो, बल्कि हो सके तो उसमें और वृद्धि ही होती रहे।
अब ऐसा मुद्दा क्या हो सकता है? विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया था। यह मुद्दा अब बासी हो चूका है, और अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने इसका मजाक बना कर रख दिया है। यद्यपि यह मुद्दा सबको प्रभावित करता है, पर मोदी को इसको ले कर लड़ाई छेड़ने से कोई लाभ नहीं होगा। इस मुद्दे पर पहले से चल रहे आन्दोलनों में से किसी एक का समर्थन या विरोध उन्हें करना ही होगा, और दोनों सूरतों में मोदी को कोई लाभ नहीं मिलेगा। रामजन्मभूमि के मुद्दे पर आन्दोलन का भाजपा ने खूब लाभ उठाया। इस मुद्दे की पहुँच भी समस्त हिन्दू समुदाय में थी, पर इसी मुद्दे पर ढुलमुल रवैये ने भाजपा की विश्वसनीयता को ही समाप्त कर दिया, और इस मुद्दे को दोबारा गरमाने की कोशिशें कोई परिणाम नहीं दे सकेंगी, चाहे उसे उठाने वाले नरेंद्र मोदी ही क्यों न हों। 
शासन-प्रणाली (Governance) एक ऐसा मुद्दा हो सकता है। मोदी ने अपने 11 वर्षों के एक बेहतर शासन-प्रणाली गुजरात-वासियों को दी, जिस पर सभी का अधिकार है। केवल बिजली क्षेत्र की बात करें, तो गुजरात के गाँवों में और केवल गुजरात के गावों में आज बिजली चौबीसों घंटे उपलब्ध है। दूसरे राज्यों में ऐसा न होने का कोई कारण नहीं है। गुजरात राज्य की बिजली कम्पनियाँ वर्ष 2006-07 से लगातार  फायदे में चल रही हैं। कोई कारण  नहीं है जिसके लिए उत्तर प्रदेश राज्य की कंपनियों को घाटे में चलना चाहिए। गुजरात में पिछले 3 सालों में 1000 मेगावाट से अधिक के सौर ऊर्जा संयंत्र  लगे हैं, जो बिहार की कुल उत्पादन क्षमता से अधिक है। उत्तर प्रदेश में इसी दौरान 5 मेगावाट का एक सौर ऊर्जा संयंत्र लगाया गया है। बिजली के क्षेत्र में चल रही इस अव्यवस्था को ले कर मोदी आन्दोलन छेड़ सकते हैं। लोग उनकी बातों को गंभीरता से लेंगे, क्योंकि गुजरात में उन्होंने इस व्यवस्था को ठीक कर के दिखाया है।  सरकारी बिजली कंपनियों के नुकसान में चलने का एक कारण (बहुत बड़ा या प्रमुख कारण नहीं) अल्पसंख्यक वर्ग के महापुरुषों के द्वारा दादागिरी से बिना पैसे दिए हुए बिजली लेना है। मेरे सामने उत्तर प्रदेश  के एक बड़े जिले के कलक्टर ने एक बैठक में कहा था कि जिला मुख्यालय के अल्पसंख्यकों के मोहल्ले में वह फ़ोर्स लेकर भी जाने की हिम्मत नहीं कर सके। बिजली के क्षेत्र में अल्पसंख्यक-तुष्टीकरण तथा उनके दबाव के आगे झुकने का खेल तो सभी जगह चल ही रहा है। बिजली क्षेत्र की अव्यवस्थाओं के खिलाफ अपने अभियान में इस खेल का ज़िक्र भी कर सकते हैं, जिस पर उन्हें उन हिन्दुओं का भी समर्थन मिलेगा, जो घोर हिंदूवादी नहीं भी हैं। मैं समझता हूँ कि अगर कोई आदमी जिसकी काम को कर दिखाने के दावे के कारण विश्वसनीयता बनी हो, अगर देश में बिजली की व्यवस्था ठीक करने का आश्वासन दे, तो जाति-धर्म की दीवारों को तोड़ कर लोग उसको समर्थन देंगे। इस मुद्दे पर पहले भी सरकारें (राज्यों की) गिरी और बनी हैं, और आगे भी गिर और बन सकती हैं।
एक बार सही मुद्दे का चयन और जनता की संवेदनाओं को झकझोरता हुआ आन्दोलन हो गया, उसके बाद तो केवल फल खाना बाकी रह जाएगा, पर यह काम भी मोदी को विश्वनाथ प्रताप सिंह की स्टाइल में ही करना होगा। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री पद इस तरह लिया था जैसे देश पर कोई एहसान कर रहे हों। मोदी को भी ऐसा ही करना होगा।















Thursday, August 25, 2011

समस्याओं से सभी ग्रस्त हैं. बात चाहे एक व्यक्ति की हो, एक परिवार, एक समूह, एक राष्ट्र या फिर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की, सब की कुछ समस्याएँ हैं, जिनका वह समाधान ढूंढ रहे हैं.
समस्याओं के बारे में कुछ बातें सामान्य तौर पर कही जा सकती हैं:
१. समस्याएँ एक-दूसरे से गुंथी होती हैं, और एक समस्या को अन्य समस्याओं से बिलकुल अलग कर के हल नहीं किया जा सकता.
२. समस्याओं के कुछ बाह्य लक्षण होते है. प्रायः उन लक्षणों के आधार पर ही उनके समाधान खोजने के प्रयास होते हैं, जो अधिकांशतः केवल आंशिक रूप से ही सफल होते हैं. समस्याओं की जड़ें काफी गहरी होती हैं, और उन्हें उसी गहराई में उतर कर हल करना पड़ता है. लक्षणों के साथ-साथ समष्टि के आधार पर भी समाधान खोजने पड़ते हैं.
३. समष्टि के आधार पर समाधान निकालने के प्रयास में हम पाते हैं कि प्रायः सभी समस्याओं की जड़ में हमारी जीवन-शैली की विकृतियाँ है, जिन्हें दूर किये बिना किसी समस्या का हल संभव नहीं है.
आगे कुछ उदाहरणों द्वारा हम इन बातों को स्पष्ट करने का प्रयास करेंगे.
आज की एक ज्वलंत समस्या - गंगा-प्रदूषण को लें. सभी जानते हैं, कि हमारी संस्कृति के प्राणों की संवाहक, हमारे पवित्रतम प्रतीकों में से एक, पतित-पावनी गंगा आज प्रदूषण से ग्रस्त हो अपने ही प्राण बचाने के लिए संघर्षरत है. पर्यावरणविद् निकट भविष्य में गंगा के सूख जाने की भविष्यवाणी कर रहे हैं. गंगा के साथ ही सनातन धर्म की रस-धारा भी शुष्क हो जायेगी. उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल के मैदानी क्षेत्रों में जन-जीवन ठप हो जायेगा, और देश का बचना ही मुश्किल हो जाएगा. गंगा (और अन्य नदियों का) प्रदूषण एक विकराल समस्या है, जिसका तुरंत समाधान ढूँढना आवश्यक है. इस समस्या के निराकरण पर हम अब तक हजारों करोड़ रूपये फूँक चुके हैं, पर परिणाम शून्य है. इसका कारण यह है कि समस्या की अभी तक सही पहचान नहीं की गयी है, और मात्र लक्षणों के आधार पर इसके समाधान के प्रयास किये गए हैं, और अभी भी किये जा रहे हैं.
गंगा में गन्दगी है, और किसी को गंगा में उतर कर यह गन्दगी साफ़ भी करनी होगी, पर भारी ताम-झाम के साथ मीडिया के सामने एक दिन कुछ कचरा गंगा से निकाल कर उसके किनारों पर बिछा देने से गंगा स्वच्छ नहीं हो जायेगी. यह तो केवल लाक्षणिक समाधान हुआ. स्थायी समाधान ढूँढने के लिए हमें और गहराई में जाना होगा. कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी जैसे बड़े नगरों की गन्दगी अंग्रेजों द्वारा बनायी गयी सीवेज-प्रणाली के द्वारा गंगा में गिर रही है. वास्तव में देखा जाय तो यह विचार, कि गंगा में अपनी गन्दगी डाल कर हम स्वच्छ रह सकते हैं, ही गंगा-प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार है, पर तुरंत इसका कोई विकल्प दिखाई नहीं देता, अतः गंगा की सफाई के लिए सीवेज-तंत्र की सफाई करनी ही होगी. गंगा की तरह ही सीवेज नालियों में भी उतर कर किसी को उनकी सफाई भी करनी होगी, पर यह भी एक तात्कालिक और लाक्षणिक उपचार ही सिद्ध होगा. और गहराई में जाने से हमें सीवेज-तंत्र के शोधन हेतु विभिन्न स्थानों पर सीवेज-ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की आवश्यकता का अनुभव होगा, पर अंततोगत्वा जब तक हम अपनी कचरा पैदा करने की प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लगाते, तब तक केवल कचरा-शोधक यंत्र लगाने से बात बनने वाली नहीं है. अगर आज हम प्रतिदिन एक टन कचरा शोधित करने वाले संयंत्र की योजना बनाते हैं, और संयंत्र लगते-लगते ही हमारी कचरा पैदा करने की क्षमता बढ़ कर दो टन प्रतिदिन हो जाती है, तो संयंत्र बेचारा क्या कर लेगा? इस प्रकार गावों में आर्थिक क्रिया-कलाप का पूर्ण अभाव, दोषपूर्ण कृषि-नीति और इसके कारण हो रहे अंधाधुंध शहरीकरण, योजनायें बनाने और उनके क्रियान्वयन के दोष इत्यादि समस्याएँ भी सीधे-सीधे गंगा-प्रदूषण से जुडी दिखती हैं, जिनका समाधान किये बिना गंगा-प्रदूषण जैसी समस्या से मुक्ति नहीं मिल सकती. कचरा पैदा करने बाह्य कारणों के साथ-साथ आतंरिक कारणों को भी ढूंढना होगा. सत्य यह है कि किसी भी नगर के किसी भी घर में बैठ कर हम जो मल विसर्जित करते हैं, वह सीवर-लाइनों और छोटी नदियों से होते हुए गंगा में ही पहुँचता है, और इस प्रकार हमारे खाने-पीने की आदतें सीधे-सीधे गंगा-प्रदूषण जैसी भीषण समस्या को जन्म देती है, या कम से कम उसकी विकरालता में योगदान करती हैं, और जिनमें सुधार किये बिना गंगा-प्रदूषण (और अन्य समस्याओं) से मुक्ति पाना कदापि संभव नहीं है. हमारे मल में हानिकारक तत्त्वों की मात्रा सीधे-सीधे हमारे भोजन से जुडी है. यदि हम पीज़ा और बर्गर जैसे खाद्य-पदार्थों पर पोषित हो रहे हैं, तो हम खतरनाक टॉक्सिन्स को गंगा में पहुंचा रहे हैं. अतः अगर हम वातावरण में विषैले टॉक्सिन्स को नहीं फैलाना चाहते, तो हमें सात्त्विक खान-पान की ओर लौटना होगा. अब मल की मात्रा की बात करें. श्वेताश्वतर उपनिषद् में योग की आरंभिक अवस्था में होने वाले अनुभवों तथा लाभों की चर्चा इस प्रकार की गयी है:
गन्धः शुभो मूत्र-पुरीषमल्पम्, योगप्रवृत्तिम् प्रथमाम् वदन्ति।
योग में प्रवृत्त होने वाले को आरम्भ में ही कुछ परिणाम मिलते हैं, जिनमें शामिल हैं: शरीर की गंध का शुभ होना, तथा मल-मूत्र का अल्प निर्माण.
अतः सात्त्विक भोजन तथा योगयुक्त जीवन को अपनाने से हम गंगा-प्रदूषण जैसी भीषण समस्या के मूल पर आघात करेंगे, तथा अन्य लाक्षणिक उपायों के साथ योग के संयोग से ही हम इस समस्या से निपट सकते हैं.
इस प्रकार हमने देखा कि कैसे गंगा-प्रदूषण की समस्या दोषपूर्ण कृषि-नीति, गावों से प्रतिभा-पलायन, दोषपूर्ण चिंतन जैसी समस्याओं से जुडी हुई है, और अपनी जीवन-शैली में सुधार किये बिना ऐसी भीषण समस्याओं के हल की बात सोची भी नहीं जा सकती.
एक और समस्या - बिजली की समस्या को लेते हैं. बिजली आज सबकी ज़रुरत है, और बिना बिजली के विकास की बातें निरर्थक लगती हैं. समस्या का जो लक्षण दिखाई देता है, वह है : हर एक के लिए जब चाहे, जहाँ चाहे बिजली का उपलब्ध न होना. ऊपरी तौर पर इसके कारण हैं : पर्याप्त मात्रा में बिजली का उत्पादन न होना, विद्युत् उपकरणों की घटिया क्वालिटी, योजना-विहीन रख-रखाव, बिजली विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार, बिजली की चोरी और उसकी बर्बादी इत्यादि. इस प्रकार नियोजन की कमियाँ, सरकारी सामान खरीदने की दोषपूर्ण प्रणाली, बिगड़ी हुई कर्म-संस्कृति तथा संसाधनों की बर्बादी जैसी समस्याएं सीधे-सीधे बिजली की समस्याओं से जुडी दिखती हैं. बिजली की चोरी पर अंकुश लगाए बिना सबके लिए बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं की जा सकती. यह अपने-आप में ही एक जटिल समस्या है, जिसको लाक्षणिक तथा समष्टि पर आधारित उपायों के संयोग से हल करना होगा. लाक्षणिक समाधन तकनीक के प्रयोग से निकल सकता है. बिजली की सप्लाई ऐसे उपकरणों के द्वारा की जा सकती है, कि चोरी करना अत्यंत कठिन हो जाये, पर एक तो यह उपकरण अत्यधिक महंगे हैं, और दूसरे इनके उपयोग के बाद भी चोरी केवल कठिन होती है, असंभव नहीं. बिजली-चोरी इस कारण से होती है कि हमारे अन्दर चौर-प्रवृत्ति है, जो अपेक्षाकृत आसानी से हो सकने वाली बिजली की चोरी का अवसर मिलते ही हमारे विवेक पर हावी हो जाती है, और फिर कठिन दण्डात्मक प्रावधान और उच्च तकनीक हमें रोक नहीं पाते. चोरी की इस प्रवृत्ति पर अंकुश कैसे लगे? - इसका उत्तर भी हमारे रहन-सहन में छिपा है. सादा तथा योगयुक्त जीवन ही चौर-प्रवृत्ति जैसे चित्त के विक्षेपों को दूर कर सकता है. याद कीजिये - अष्टांग योग के पहले अंग 'यम' का तीसरा यम है - अस्तेय. बिना अस्तेय की साधना किये चोरी जैसे दुर्गुण से मुक्ति पाने की बात सोची भी नहीं जा सकती. ऊपर श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् के जिस श्र्लोक का उद्धरण दिया गया है, उसकी पहली पंक्ति है -
लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वम्, वर्णप्रसादम् स्वरसौष्ठवम् च।
लघुता (शरीर का हल्का होना), आरोग्य (बीमारियों से मुक्ति), अलोलुपत्व (लोलुपता - लालच का न होना), वर्णप्रसाद (शरीर में कान्ति का होना), तथा स्वर-सौष्ठव (कण्ठ की मधुरता) - योग-मार्ग में प्रवृत्त होने वालों को आरम्भ में ही यह लाभ मिल जाते हैं. योगी कभी चोर नहीं हो सकता.
यह दो उदाहरण यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि अपनी जीवन-शैली ठीक करने के अतिरिक्त हमारे पास कोई विकल्प नहीं है, चाहे हम महंगाई पर अंकुश लगाने की बात कर रहे हों, चाहे भ्रष्टाचार पर काबू करने की. और जब भी सही जीवन-शैली की बात होगी, योग की बात अवश्य होगी, अतः यह कहना अतिशयोक्ति  नहीं होगा कि योग में ही हमारी सभी समस्याओं का हल छिपा है.
आज मुख्यतया स्वामी रामदेव जी के प्रयासों के फलस्वरूप काफी लोग योग के एक महत्त्वपूर्ण अंग - प्राणायाम से परिचित हो चले हैं, पर अधिकाँश लोग इसे केवल गंभीर बीमारियाँ दूर करने वाले तथा शारीरिक स्वाथ्य को बनाए रखने वाले एक उपाय के तौर पर ही जानते हैं, पर यह तो प्राणायाम का एक साधारण लाभ है, जो अभ्यास के आरंभिक चरणों में ही प्रकट हो जाता है. प्राणायाम का सुदीर्घ अभ्यास मनुष्य को उच्चतर आध्यात्मिक उपलब्धियों के लिए तैयार करता है. पतंजलि ऋषि कहते हैं - "ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्।" प्राणायाम का अभ्यास प्रकाश पर पड़े हुए माया के आवरण को हटा देता है. केवल स्वास्थ्य के लिए प्राणायाम करने वाले लम्बे समय तक प्राणायाम नहीं कर पाते, पर जो व्यक्ति प्राणायाम को नियमित अभ्यास के द्वारा स्वभाव में ढाल लेते हैं, वह सहज ही योग के अन्य अंगों - यम, नियम, आसन, प्रत्याहार, ध्यान और धारणा को साधते हुए सविकल्प और तदुपरांत निर्विकल्प समाधि को प्राप्त करते हैं, इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है. ऐसे योगी की आवश्यकताएं सीमित होती हैं, और वह प्रकृति और समाज से पूर्ण सामंजस्य स्थापित कर के आनंदमय जीवन जीता है.
स्वामीजी ने इसी लिए देश का उद्धार योग-मार्ग से करने का बीड़ा उठाया है. हमारे लिए यही अभीष्ट है कि इस अवसर का लाभ उठाते हुए योगी बनें, क्योंकि इसी में हमारी भौतिक तथा आध्यात्मिक उपलब्धियों का मार्ग निहित है.
योगेश्वर श्रीकृष्ण का भी वचन है :
योगो भवति दुःखहा।